2020 में कब मनाई जाएगी होली

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होली का पर्व

2020 में कब मनाई जाएगी होली, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

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तथा होलाष्टक क्या है और कब मनाया जाता है।
होली का त्योहार क्यों मनाते हैं?
‘रंगों के त्यौहार’ के नाम से मशहूर होली (Holi) का त्यौहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा (वसंत ऋतु) तिथि को मनाया जाता है यह मुख्य रूप से भारतीय और नेपाली पर्व हैहोली पर ढोल-नगाड़े और तेज़ संगीत की आवाज़ के साथ तेज़ महिलाये और पुरुष एक दूसरे को रंग लगते है और डांस करते है तथा एक दूसरे पर रंग और पानी फेंकते है होली को कई राज्यों में तीन दिनों तक मनाया जाता है

होली पर मीठे पकवान एवं मिठाईया भी बनाई जाती है इन पकवानों में गुजिया होली का प्रमुख पकवान है। गुजिया मैदे के मिश्रण में खोया (मावा) एवं मेवाओं मिश्रण के भरावन से बनाया जाता है। इस दिन कांजी वड़ा खाने – खिलाने का भी रिवाज है।होली की शाम को लोग नए कपड़े पहन कर एक – दूसरे से होली मिलते है। जहाँ पर होली मिलने आये लोगों का स्वागत गुजिया, फल, मिठाई, नमकीन व ठंडाई (होली का प्रिय पेय) दे कर किया जाता है।

 

भारत के अन्य त्यौहारों की भाती ही होली को भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मन गया है।होली से जुडी अनेको पौराणिक कथाये भी है जिनमे से कुछ कथाये https://sangeetaspen.com ब्लॉग के माध्यम से आपके सामने है
1) हिरण्यकश्यप की कहानी
2) राक्षसी ढुंढी की कहानी
3) राधा कृष्ण के रास की कहानी
4) कामदेव के पुनर्जन्म की कहानी

कब मनाई जाएगी होली ?

2020  में होली 9 मार्च और 10 मार्च को मनाई जाएगी। 9 मार्च, सोमवार (Monday) के दिन होलिका दहन (Holika Dahan) व होली पूजन (Holi Pujan) किया जाएगा। 10 मार्च 2020  मंगलवार (Tuesday) को रंगों से होली खेली जाएगी।

होलिका दहन 9 मार्च, सोमवार (Monday) के दिन होलिका दहन (Holika Dahan)

9 मार्च, सोमवार (Monday) के दिन होलिका दहन (Holika Dahan)

संध्याकाल में 06 बजकर 22 मिनट से 8 बजकर 49 मिनट तक।
भद्रा पुंछ – सुबह 09 बजकर 50 मिनट से 10 बजकर 51 मिनट तक।
भद्रा मुख – सुबह 10 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 32 मिनट तक।

होलाष्टक क्या है और कब मनाया जाता है

इस वर्ष (2020) में होलाष्टक 3 मार्च मंगलवार (Tuesday) से आरंभ होगा और यह (होलाष्टक) होली तक चलेगा इन दिनों में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किये जाते है। प्रत्येक वर्ष होलाष्टक आठ दिनों का होता है। परन्तु इस वर्ष (2020) में सात दिन का ही होगा।

होली पर्व पर हिरण्यकश्यप की कहानी

होली पर्व पर अनेकों कहानियाँ कही जाती है। जिसमें सबसे प्रसिद्ध कहानी महान (हरी भक्त) प्रह्लाद की है। प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर राजा था।

 

 

अपने बल के अभिमान में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी।

 प्राचीन भारत में एक अत्यंत बलशाली असुर राजा हिरण्यकश्यप रहता था । वह भगवान विष्णु से अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेने के लिए भगवान विष्णु को मर्म चाहता था, जिसके लिए उसने अनेको वर्षो तक भगवान ब्रमा की कठोर साधना की और मनचाहा वरदान मांगा उसने वरदान मांगा की ना में दिन में मरु और ना रात में,ना आकाश में मरू ना पाताल में ना देव मुझे मार सके और ना दानव आखिरकार भगवान ब्रमा ने उसे वरदान दे दिया ।

 

वरदान मिलने के पश्चात हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा और लोगों अपनी पूजा भगवान की तरह करवाने लगा। हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था जिसका नाम प्रहलाद था और वह भगवान इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, इसलिए होली का त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है।।ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया।

 

उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी और प्रहलाद बागवान विष्णु की कृपा से बच गया पर होलिका जल गई ।

 

इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, इसलिए होली का त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है।।

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