Dutiya in Kumaon : कुमाऊं में दीपावली पर स्थानीय फसलों के बनाए जाते है, व्यंजन

आस्था

Dutiya in Kumaon : कुमाऊं में दीपावली पर लाल पर्वतीय (स्थानीय फसलों) धान को ओखली में कूट कर तैयार किये जाते है,च्यूणे 
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Dutiya in Kumaon : कुमाऊं में दीपावली माने का कुछ अलग ही अंदाज है। कहीं 11 दिन बाद तो कहीं एक माह बाद यह त्‍योहार मनाया जाता है। इस पर्व पर स्थानीय फसलों के व्यंजन भी बनाए जाते है। ऐसा ही एक व्यंजन है च्यूड़ा

गोवर्द्धन पूजन के अगले दिन भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन विवाहित बेटियां मायके पहुंच भाइयों का च्यूणपूजन (करीब पांच दिनों से तांबे के बर्तन में भिगो कर रखे गए लाल पर्वतीय धान को ओखली में कूट कर तैयार च्यूणे) कर मंगल व सुखी जीवन की कामना करती है। महालक्ष्मी पूजन के 11वें दिन एकादशी को कुमाऊं में बूढ़ी दीपावली मनाने की परंपरा है।

Dutiya in Kumaon : च्यूड़ा बिना सुखाये हुए ताजे धान या पानी में भिगाये धानों को भारी तले की कढ़ाई में अच्छी तरह भूनने के बाद गरम गरम ही ऊखल में कूट कर च्यूड बग्वाली या भैयादूज के लिए बनाये जाते हैं जिन्हें शुभ आशीष के साथ सर पर वारा जाता है. ऊखल में कूटने के बाद सूपे में फटका के धान की भूसी निकल जाती है और लाल भूरे रंग के चपटे च्यूड़ साफ हो जाते हैं. च्यूडों को जितना चबाओ उतने स्वाद लगते हैं. च्यूड़ों को अखरोट, भूने हुए भांग, तिल के साथ इनका मेल बहुत स्वाद और पुष्टिकारक होता है.

कुमाऊँ में भैय्यादूज मनाया नहीं जाता है.भैय्यादूज ( बग्वाली) का दूसरा ही रूप यहां है, लेकिन भैय्यादूज कब यहॉ की लोक संस्कृति में घुस गया किसी को पता ही नहीं चला .

कुमाऊंनी परंपरा के अनुसार दुतिया के त्यौहार के अवसर पर घर के समस्त सदस्यों के सिर पर च्यूड़े रखे जाते हैं तथा दूब (घास ) की सहायता से सिर पर तेल लगाया जाता है इस तरह मनाया जाता है ,दुतिया का त्यार।

यहां भैय्यादूज ( बग्वाली) की जगह दूतिया त्यार मनाने की लोक परम्परा रही है. इसे मनाने की तैयारी कुछ दिन पहले से शुरू हो जाती है. कहीं एकादशी के दिन, कहीं धनतेरस के दिन और कहीं दीपावली के दिन,

बग्वाली. ये यम द्वितीया है.मान्यता है कि यमराज भी इस दिन अपनी बहन यमुना के यहाँ टीका लगाने आए थे. यमुना ने अपने भाई का स्वागत किया पूजा की और गन्धाक्षत किया. यमराज अपनी बहिन के सेवा सत्कार से बहुत खुश हुए और वर मांगने को कहा. यमुना ने कहा की अब से प्रत्येक वर्ष यम द्वितीया भाई -बहिन के प्रेम के पर्व के रूप में मनाई जाए. तभी से भाई अपनी बहिनों के घर जाते हैं. बहिनें उनका आदर सत्कार कर पिठ्या अक्षत लगातीं, सुस्वादु भोजन करातीं हैं. भाई उन्हें भेंट स्वरूप वस्त्र व धन भेंट करते हैं.

इस दिन च्यूड़ों का विशेष महत्व है. च्यूड़ों के लिए एक शाम पहले या कुछ दिन पहले एक तौले (एक बर्तन) में धान पानी में भिगाने के लिए डाल दिए जाते हैं. गौवर्धन पूजा के दिन इस धान को पानी में से निकाल लिया जाता है. उन्हें देर तक कपड़े में रखा जाता है बांध कर के. ताकि उसका सारा पानी निथर जाय. उसके दो-एक घंटे बाद उस धान को कढ़ाई में भून लिया जाता है. उसके बाद उसे गर्मा-गर्म ही ओखल में मूसल से कूटा जाता है.

Dutiya in Kumaon : गर्म होने के कारण चावल का आकार चपटा हो जाता है और उसका भूसा भी निकल कर अलग हो जाता है. बाकि बचे भूसी को बाद में सूपे में फटका केअलग निकल जाती है इस प्रकार लाल भूरे रंग के चपटे च्यूड़ साफ हो जाते हैं. इन हल्के भूने हुए चपटे चावलों को ही “च्यूड़े”कहते हैं. च्यूड बग्वाली या भैयादूज के लिए बनाये जाते हैं जिन्हें शुभ आशीष के साथ सर पर वारा जाता है.च्यूडों को जितना चबाओ उतने स्वाद लगते हैं. च्यूड़ों को अखरोट, भूने हुए भांग, तिल के साथ इनका मेल बहुत स्वाद और पुष्टिकारक होता है.

जिस बर्तन में च्यूड़े रखे जाते हैं, उसमें थोड़ा कच्ची हल्दी को कूट कर और हरी दूब के एक गुच्छे को सरसों के तेल से भरे कटोरे के साथ सबसे ऊपर रखा जाता है. ये च्यूड़े सिर में चढ़ाने के साथ ही खाने के लिए भी बनाए जाते हैं. च्यूड़ों को अखरोट, भूने हुए भांग, तिल के साथ खाने का एक कारण यह भी है की .दीपावली के बाद ठंड में भी तेजी आ जाती है

और ठंड में च्यूड़ों को अखरोट, तिल व भूने हुए भांग के साथ खाने से जहां शरीर को गर्मी मिलती है, वहीं इनमें कई तरह के पौष्टिक तत्व होने से शरीर का ठंड से बचाव भी होता है. च्यूड़े बनाने से पहले दीपावली के दिन ओखल के चारों से गेरू से लिपाई की जाती है और शाम को ओखल में फूल चढ़ाकर उस पर एक दीया भी रखा जाता है.

गोवर्धन पूजा के दिन भी च्यूड़े बनाने से पहले ओखल की धूप जलाकर पूजा की जाती है, उसके बाद ही च्यूड़े बनाने का कार्य किया जाता है. ओखल की पूजा का मतलब है कि उससे कूटा हुआ स्वादिष्ट अनाज पूरे परिवार को साल भर खाने को मिले और परिवार में किसी को भी कभी भूखे पेट न सोना पड़े.

च्यूढ़े चढ़ाने

Dutiya in Kumaon : बालिकाएं कन्याएँ दूब से तेल लगा पिठ्या अक्षत लगा अपने परिवारजनों सम्बन्धियों व सभी के सिरों को च्यूड़ों से पूजतीं हैं. मस्तक से ले कर नीचे चरण तक दोनों हाथ की उँगलियों में च्यूड़े ले वारे जाते हैं. सर पर च्यूड़े रखने को च्यूड़े चांपना कहा जाता है. सभी बड़ों के पिठ्या अक्षत कर च्यूड़े धरने के बाद कन्याओं को दक्षिणा मिलती है.

यम द्वितीया के सायंकाल चन्द्रमा के दर्शन कर उस पर च्यूड़े चढ़ा उसकी आरती उतारी जाती है. बग्वाली के दिन घर के सभी सदस्यों को च्यूड़े चढ़ाए जाते. बुजुर्गों के द्वारा आशीर्वाद दिया जाता है, ‘जी रये, जागी रये, यो दिना, यो मास भेटनें रये.’च्यूढ़े परिवार के सदस्यों के अलावा गाय व बैल के सिरों में भी चढ़ाये जाते हैं .

च्यूढ़े चढ़ाने से पहले उनके सींग में सरसों का तेल लगाया जाता है. गले में फूलों की माला पहनाई जाती है. उसके बाद गाय व बैल के माथे पर भी पिठ्ठयॉ लगाया जाता है और फिर सिर में च्यूढ़े चढ़ाए जाते हैं. यह बताता है कि हमारे लोक की परम्परा में पालतू जानवरों को भी एक मुनष्य की तरह का दर्जा दिया जाता रहा है, क्योंकि लोक का जीवन पालतू जानवरों (गाय, बैल) के बिना अधूरा है.

दीपावली के दिन से मिट्टी के दीयों को संध्या काल में जलाने का क्रम हरिबोधिनी एकादशी तक चलता है. एकादशी के दिन घर द्वार के ऊपर या अगल बगल लक्ष्मी नारायण के चित्र बनाये जाते हैं. दिन भर इस दिन उपवास रखा जाता है. घर के मुख्य स्थानों और पूजा घर में पौ दिए जाते हैं.

 

 

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