Story of Field Marshal Sam Manekshaw|पूर्व आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ

हेल्थ
Field Marshal Sam Manekshaw|vijay diwas 16 december| पूर्व आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ
Field Marshal Sam Manekshaw|vijay diwas 16 december| पूर्व आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ

Table of Contents

पूर्व आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ | Field Marshal Sam Manekshaw | vijay diwas 16 december 

Sam Manekshaw : सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था।सैम मानेकशॉ (Sam Manekshaw)का पूरा नाम ‘सैम होर्मूसजी फ़्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ’ था। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में की और बाद में वे नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए 40 छात्रों में से एक थे।

Advertisement

वहां से मानेकशॉ कमीशन प्राप्ति के बाद भारतीय सेना में भर्ती हुए। 1937 में एक सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर गए सैम मानेकशॉ की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। दो साल की यह दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को विवाह में बदल गई। 1969 को उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया गया।सैम मानेकशॉ भारतीय के नेतृत्व में भारत ने सन् 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त किया था जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ था। 1973 में सैम मानेकशॉ को फ़ील्ड मार्शल का सम्मान प्रदान किया गया। सैम मानेकशॉ भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल थे। 15 जनवरी, 1973 में सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त हुए।

अदम्य साहस और युद्धकौशल के लिए मशहूर, भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम दस्तखत करने वाले सबसे ज्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर पद्म भूषण, पद्म विभूषण सैम मानेकशॉ भारत के पहले ‘फ़ील्ड मार्शल’ थे। अपने 40 साल के सैनिक जीवन में उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के अलावा चीन और पाकिस्तान के साथ हुए तीनों युद्धों में भी भाग लिया था। उनके दोस्त उन्हें प्यार से ‘सैम बहादुर’ कहकर बुलाते थे।

1971 में पाकिस्तान को हर मोर्चे पर शिकस्त देने वाले पूर्व आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था। उनका पूरा नाम होरमुजजी फ्रामदी जमशेदजी मानेकशॉ था। उनका परिवार पहले गुजरात के वलसाड में रहता था बाद में सैम मानेकशॉ का परिवार पंजाब आ गया।

पंजाब आने के बाद मानेकशॉ की प्रारंभिक शिक्षा भी पंजाब के अमृतसर में हुई। बाद में आगे की पढ़ाई के लिए मानेकशॉ ने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में अपना दाखिला करवाया। मानेकशाॅ बचपन से ही निडर और बहादुर थे। जिसके कारण उनके चाहने वाले उन्हें सैम बहादुर के नाम से पुकारते थे। 1932 मानेकशॉ देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी में 40 छात्रों में से एक छात्र थे जो पहले बैच के लिए चुने गए। वहाँ से मानेकशॉ कमीशन प्राप्ति के बाद 1934 में भारतीय सेना में भर्ती हुए।

1937 में सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर जाना हुआ वहाँ पर मानेकशॉ की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। यह मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गयी और दो साल की दोस्ती के बाद 22 अप्रैल 1939 को मानेकशॉ और सिल्लो बोडे का दोस्ती का रिश्ता विवाह में बदल गया। 1969 को सैम मानेकशॉ सेनाध्यक्ष बनाया गया और 1973 में फील्ड मार्शल का सम्मान प्रदान किया गया। सैम मानेकशॉ एक ऐसे जाबाज़ जवान थे जो अपनी बहादुरी और साहस की वजह से ही भारतीय सेना के पहले ऐसे जनरल बने जिनको प्रमोट कर फील्ड मार्शल की रैंक प्रदान की गई थी।

1973 में सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे तमिलनाडु के वेलिंगटन में रहने लगे। अपनी वृद्धावस्था के दौरान मानेकशॉ को फेफड़े में कोई बीमारी होने लगी और मानेकशॉ कोमा में चले गए। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का निधन सैन्य अस्पताल के आईसीयू (वेलिंगटन) में 27 जून 2008 को रात के 12.30 बजे हो गया था।

सैम मानेकशॉ की जिंदादिली

सैम मानेकशॉ की जिंदादिली के अनेको किस्से है उनमे से एक किस्सा बड़ा मशहूर है. 1942 में बर्मा में जापान से लड़ाई में सैम को 7 गोलियां लगी थीं, और उनका बचना बहुत मश्किल था. गंभीर हालत में सैम को अस्पताल लाया गया. ऑपरेशन टेबल पर डॉक्टर ने उनसे पूछा- आपके साथ क्या हुआ था? तो उन्होंने हंसते हुए कहा- ‘मुझे एक खच्चर ने लात मार दी है’. उनके जज्बे के आगे मौत भी हार गई और वो ऑपरेशन सफल रहा.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को ‘मैडम’ कहने से इंकार किया था।

Field Marshal Sam Manekshaw|पूर्व आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ |
Field Marshal Sam Manekshaw

मानेकशॉ के कुछ रोचक पहलु

‘अ लाइफ लिव्ड सच’ नाम से एक डाक्यूमेंट्री फिल्म में फील्ड मार्शल मानेकशॉ की हाज़िरजवाबी और प्रभावशाली पर्सनालिटी डॉक्यूमेंट की गई थी.

1962 में जब मिजोरम की एक बटालियन ने भारत- चाइना की लड़ाई से दूर रहने की कोशिश की तो मानेकशॉ ने उस बटालियन को पार्सल में चूड़ी के डिब्बे के साथ एक नोटभेजा. जिस पर लिखा था कि अगर लड़ाई से पीछे हट रहे हो तो अपने आदमियों को ये पहनने को बोल दो. फिर उस बटालियन ने लड़ाई में हिस्सा लिया और काफी अच्छा काम कर दिखाया. अब मानेकशॉ ने फिर से एक नोट भेजा जिसमें चूड़ियों के डिब्बे को वापस भेज देने की बात की गई थी.

वह हमेशा अपनी बातों को खुलकर कहना जानते थे। कहा जाता है कि मानेकशॉ ने एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को ‘मैडम’ कहने से इनकार किया था। जब उनसे पूछा गया कि आपने ऐसा क्यों किया। तब उन्होंने कहा था मैडम शब्द का प्रयोग एक खास वर्ग के लिए किया जाता है। मानेकशॉ ने कहा कि मैं (मानेकशॉ) उन्हें प्रधानमंत्री ही कहूँगा।

ZEE NEWS के अनुसार : बांग्लादेश युद्ध में भारत को मिली जीत के बाद सैम मानेकशॉ काफी लोकप्रिय हो चुके थे. तब ऐसी अफवाहें उड़ने लगी थीं कि वे तख्तापलट कर सकते हैं.

तब इंदिरा गांधी ने उन्हें बुलाकर उनसे पूछा- ‘सुना है तुम तख्तापलट करने वाले हो. बोलो क्या ये सच है?’ सैम मानेकशॉ ने कहा- ‘आपको क्या लगता है? आप मुझे इतना नाकाबिल समझती हैं कि मैं ये काम भी नहीं कर सकता!’ फिर रुक कर वे बोले- ‘देखिये प्राइम मिनिस्टर, हम दोनों में कुछ तो समानताएं हैं.

मसलन, हम दोनों की नाक लम्बी है पर मेरी नाक कुछ ज़्यादा लम्बी है आपसे. ऐसे लोग अपने काम में किसी का टांग अड़ाना पसंद नहीं करते. जब तक आप मुझे मेरा काम आजादी से करने देंगी, मैं आपके काम में अपनी नाक नहीं अड़ाउंगा.

मानेकशॉ ने इंदिरा गाँधी को स्वीटी कहा था।

इस दौरान एक रोचक घटना और हुई थी। जब इंदिरा गाँधी के द्वारा जनरल से पूछा गया कि क्या आप जंग के लिए तैयार है तो मानेकशॉ ने कहा-“आई एम ऑलवेज रेडी स्वीटी।”

इन सब बातों के बीच कुछ ऐसी दुःखद हकीकत की बातें भी है जो प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने सन् 1973 के बाद मानेकशॉ का वेतन बंद कर दिया गया था।

ये बात (हकीकत) 1971 की है, जब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी . उस समय फिल्ड मार्शल मानेकशा आर्मी चीफ थे। इंदिरा जी ने उन्हें पाकिस्तान पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। मानेकशॉ ने कहा सैनिक तैयार है पर हम उचित समय पर युद्ध करेंगे।

मानेकशा प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से बोले, “मैं आपके राजकाज में दखल नहीं देता, वैसे ही आप भी सैन्य कार्यवाही में दखल मत दीजिये।” तब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने मानेकशॉ के कार्यकाल को 6 माह और बड़ा दिया।

सैम मानेकशॉ एक ऐसे व्यक्ति थे जो प्रधानमंत्री की बात को इनकार करने की हिम्मत रखते थे

सैम मानेकशॉ बेहद बेबाक थे वो इस किस्से से समझा जा सकता है. भारत-पाकिस्तान के बीच जब 1971 का युद्ध शुरू हुआ था, उस समय इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वह मार्च के महीने में लड़ा जाए. लेकिन सैम जानते थे कि युद्ध के लिए तैयारी पूरी नहीं है, ऐसे में उन्होंने इंदिरा को लड़ने के लिए मना कर दिया था. उनकी ‘ना’ सुनने के बाद इंदिरा गांधी नाखुश थीं, लेकिन सैम ने कहा, अभी हमारी सेना की तैयारी नहीं है, यदि अभी युद्ध लड़ा तो हार जाएंगे. क्या आप जीत नहीं देखना चाहती? सैम मानेकशॉ ही थे

जो प्रधानमंत्री की बात को इनकार करने की हिम्मत रखते थे. इंदिरा गांधी को मना करने के सात महीने के बाद सैम मानेकशॉ ने युद्ध के लिए हामी भरी थी.

उचित समय पर ही चढ़ाई करके सिर्फ़ 13 दिनों में पूर्व पाकिस्तान को बांग्लादेश बना दिया। उचित समय पर मानेकशॉ की सेवानिवृत्ति 1972 में होनी थी, लेकिन उन्हें 19 जनवरी 1973 में सेवानिवृत्त किया गया और इस प्रकरण के पश्चात 1973 के बाद मानेकशा का वेतन बंद कर दिया गया,

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी ने तत्काल कार्यवाही करके उनकी शेष राशि का भुगतान

परंतु मानेकशॉ ने कभी अपने वेतन की मांग नहीं की। लगभग 25 साल बाद एक दिन ए. पी. जे. अब्दुल कलाम अपने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए मानेकशॉ से मिलने गए। जब मानेकशॉ हॉस्पिटल में थे तब कलाम को इस बात का पता चला कि जिस व्यक्ति (योद्धा) ने अपने देश के लिए 5–5 युध्द लड़े उस वीर योद्धा को 1973 के बाद से वेतन ही नहीं दिया गया।

तब ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी ने तत्काल कार्यवाही करके उनकी शेष राशि का भुगतान कर (लगभग 1.3 करोड़ रुपये का चेक) उनको भिजवाया। ए. पी. जे. अब्दुल कलाम 2002 से 2007 तक हमारे देश (भारत) के राष्ट्रपति रहे।

Q : सैम मानेकशॉ पुण्यतिथि

Ans : 27 जून 2021 को जनरल सैन मानेकशॉ की 11वीं पुण्यतिथि है।

Q : मानेकशॉ की पेंशन

Ans : 2008 में छठे आयोग की सिफारिशों के बाद तो उन्हें कर्नल की पेंशन मिल रही थी, जबकि वे मेजर जनरल के पद पर रिटायर हुए थे।

Q : भारत के प्रथम फील्ड मार्शल कौन थे

Ans : भारत के प्रथम फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ थे

Q : सैम मानेकशॉ को कितनी गोलियां लगी थीं?

Ans : लड़ाई के मैदान में सात गोलियां लगने के बाद जब जनरल मानेकशॉ मिलिट्री अस्पताल पहुंचाए गए, तब डॉक्टर ने उनसे पूछा कि क्या हुआ है. मानेकशॉ का कहना था कि कि अरे कुछ नहीं, एक गधे ने लात मार दी. कि अरे कुछ नहीं, एक गधे ने लात मार दी.

Q : सैम मानेकशॉ के जीवन पर कोन सी फिल्म बनी हैं ?

Ans : डायरेक्टर मेघना गुलजार द्वारा फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ पर बायोपिक फिल्म बनायी गयी जिसका नाम ‘सैम बहादुर’ हैं। सैम तो मानेकशॉ के नाम से ही लिया गया है, जबकि बहादुर उनकी विशेषता है. वैसे गोरख सेना उनको प्यार से सैम बहादुर कहकर ही पुकारती थी। और इस फिल्म में विक्की कौशल ने सैम मानेकशॉ का किरदार निभाया हैं

Q : जनरल करिअप्पा कौन थे?

Ans : फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा, ऑर्डर ऑफ़ ब्रिटिश एम्पायर, मेन्शंड इन डिस्पैचैस, लीजियन ऑफ मेरिट (28 जनवरी1899 – 15 मई 1993) भारत के पहले सेनाध्यक्ष थे। उन्होने सन्1947 के भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व किया। वे भारत के दो फील्ड मार्शलों में से एक हैं।.

Q : भारत की सेना कौन से नंबर पर आती है?

Ans : सेना के आकार के मामले में चीन के बाद दूसरे स्थान पर भारत काबिज है। भारत के कुल सक्रिय सैन्यकर्मियों की संख्या 1,445,000 है। इसमें भारतीय थल सेना, भारतीय वायु सेना और भारतीय नौसेना के कर्मी शामिल हैं

Q : फील्ड मार्शल बनने के लिए क्या करना पड़ता है?

Ans : फील्ड मार्शल (Field marshal) सेना का अत्यन्त उच्च पद होता है जो ‘जनरल’ से भी ऊँचा पद है। प्रायः यह थलसेना का सर्वोच्च पद है जो गिने-चुने लोगों को ही प्रदान किया जाता है
फील्ड मार्शल
यह पद सेना में सबसे बड़ा होता है लेकिन यह पद सम्मान के रूप में दिया जाता है।
फील्ड मार्शल के बैज पर 5 बिंदु स्टार, राष्ट्रीय प्रतीक तथा क्रॉस बैटन के साथ गोल्डन लॉरेल पुष्पांजलि की माला बनी हुई होती है।
ये इंडियन आर्मी की सबसे बड़ी उपाधि होती है
ये उपाधि युद्धकालीन के समय उनकी बहादुरी के लिए दी जाती है।

Q : इंडियन आर्मी का फील्ड मार्शल कौन है?

Ans : भारतीय वायुसेना में सर्वोच्च रैंक एयर फोर्स के मार्शल का है, जिसे केवल असाधारण परिस्थितियों में भारत के राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है।यह एक पांच सितारा रैंक है और सेना में फील्ड मार्शल और नौसेना में बेड़े के एडमिरल के बराबर है।

Q : भारत में अब तक कितने फील्ड मार्शल हुए हैं?

Ans : आज तक सिर्फ दो सैन्य अधिकारियों ने ही इस पद को धारण किया है जिनमे सैम मानेकशॉ (Sam Manekshaw) भारत के पहले फील्ड मार्शल थे , और जनवरी 1973 में पद से सम्मानित किया गया दूसरा थे Kodandera एम करियप्पा, 14 जनवरी 1986 फील्ड मार्शल पर रैंक प्रदान किया गया भारतीय बेड़े के एक एडमिरल के बराबर है

Leave a Reply