how to recover from dengue fever fast | ayurvedic herbs to prevent dengue fever, viral infection and boost immunity | effective ayurvedic tips to treat dengue fever

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how to recover from dengue fever fast
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Monsoon, Ayurved and dengue fever | Dengue treatment in hindi | effective ayurvedic tips to treat dengue fever | important herbs for good health |ayurvedic herbs to prevent dengue fever, viral infection and boost immunity | How to recover from dengue fast | वायरल इन्फेक्शन और डेंगू या मलेरिया से बचने और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करेंगी ये आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां

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Monsoon : बारिश (Monsoon/Rainy Season) का मौसम जारी है और इस दौरान बारिश की वजह कई तरह के संक्रमण और मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। हर साल देखा जाता है कि जुलाई और नवंबर के बीच डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे गंभीर जानलेवा बीमारियों के मामले चरम पर होते हैं।

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इसमें कोई शक नहीं है कि बरसात का मौसम जितना सुहावना होता है, उतना ही घातक भी होता है। इस मौसम को लेकर सबसे चिंता की बात यह है कि इस दौरान इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है और यही वजह है कि आप आसानी से बीमार हो सकते हैं। बारिश का मौसम सिर्फ डेंगू या मलेरिया (dengue fever,maleriya) ही नहीं बल्कि चिकनगुनिया, हैजा, टायफाइड, वायरल बुखार, डायरिया, इन्फ्लूएंजा और कई तरह के पेट के संक्रमण का कारण बन सकता है।

इन रोगों के लिए मेडिकल में कई तरह के इलाज हैं लेकिन आप sangeetaspen.com के माध्यम से बताये गए इन कुछ आयुर्वेदिक उपायों (tips) को इस्तेमाल (आजमाकर) इस मौसम के सबसे गंभीर बीमारी डेंगू का इलाज घर में आराम से कर सकते हैं।

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आयुर्वेद को सेहत का खजाना कहा जाए तो गलत नहीं होगा. हर जड़ी-बूटी अपने भीतर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के कई गुण समेटे हुए है. वैसे तो आयुर्वेद में लगभग 1,200 औषधीय जड़ी-बूटियों का वर्णन है. लेकिन यहां उन जड़ी बूटियों के बारे में बताया गया है जो आसानी से उपलब्ध हो सकें. इनमें से कई तो ऐसी हैं जिनके पौधे लोग घरों में बड़े शौक से लगाते हैं

आयुर्वेद और डेंगू

आयुर्वेद के अनुसार, डेंगू बुखार को ‘विशामा ज्वर’ की एक किस्म के रूप में समझा जा सकता है। इसमें तापमान में उतार-चढ़ाव होता है। यह वात और पित्त के बढ़ने को दर्शाता है। आयुर्वेद में बताए गए कुछ उपायों के इस्तेमाल से इस लगातार फैलने वाली संचारी बीमारी को रोका जा सकता है। आप कुछ जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करके इम्यून सिस्टम को मजबूत बना सकते हैं और तेज बुखार, शरीर में दर्द, प्लेटलेट काउंट में कमी और थकान से जुड़े लक्षणों को कम कर सकते हैं।

herbs to prevent dengue fever, viral infection and boost immunity
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तो आइये जानते हे उन कुछ जड़ी-बूटियों के बारे में जो हम सब को जैसी खतरनाक बीमारी से बचने में सहयोग करें

गुडूची (गुडूचि, अमृता) – गिलोय या टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया को आयुर्वेद में एक आदर्श और सबसे मूल्यवान जड़ी बूटी माना गया है,गिलोय अथवा अमृता अपने नाम से ही अपने गुण को दर्शाती है. यह एक बेल है जिसके तने से रस निकालकर अथवा सत्व बनाकर प्रयोग किया जाता है. जो डेंगू बुखार के प्रमुख कारक वात और पित्त दोनों को कम करने में मदद करती है। गुडूची डेंगू के मरीजों में रोग की रोकथाम और उपचार दोनों में मदद करता है।

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डेंगू हो जाने पर द्ब्रलड प्लेटलेट्स की घटी मात्रा को बहुत जल्दी सामान्य करती है. खून के अत्यधिक बह जाने और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए तो यह रामबाण है। आप इसे पानी में भिगोकर रख दें और सुबह इसका पानी पिएं। यह स्वाद में कड़वी है। लेकिन त्रिदोषनाशक होती है. इसका प्रयोग वातरक्त (गाउट), आमवात (आर्थराइटिस), त्वचा रोग, प्रमेह, हृदय रोग आदि रोगों में होता है।

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सहजन – यह पेड़ पूरे भारत में बहुतायत से होता है तथा इसके पत्ते और फलियों का उपयोग किया जाता है. इसकी फलियों को तो सांभर में भी डाला जाता है. यह बलवर्धक होने के साथ ही जीर्ण ज्वर में बेहद उपयोगी है.

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कलामेघ (Kalamegha) – यह आयुर्वेदिक जड़ी बूटी विशेष रूप से तीनों दोषों को संतुलित करने में मदद करती है। यह गर्म होने के साथ कसैला होता है, जिसका चयापच पर प्रभाव पड़ता है। यह विशेष रूप से वात और पित्त के प्रसार को कम करता है। यह इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में भी सहायक है और रोग को रोक सकता है।

घृतकुमारी (कुंवारपाठा) – यह सर्वाधिक पाया जाने वाला छोटा-सा मांसल पत्तियों वाला पौधा है जो कि कई रोगों में अत्यंत उपयोगी है. इसके पत्तों के बीच का गूदा बाह्य उपयोग में त्वचा रोगों में काम आता है. स्त्रियों के मासिक धर्म की अनियमितता को खत्म करने में कारगर है, यकृत (लीवर), तिल्ली (स्पलीन) तथा पाचन संबंधी बीमारियों और आर्थराइटिस के इलाज में इसका खूब प्रयोग होता है

अशोक – अशोक की छाल बेहद गुणकारी होती है. यह स्त्री संबंधी रोगों में बेहद उपयोगी पाई गई है. यह विशेषतया श्वेत प्रदर, रक्त प्रदर, हृदय, दाहहर तथा अपच में उपयोगी है. वैसे इसके नाम में ही इसके गुण झलकते हैं. अशोक अर्थात अपने नाम को सिद्ध करने वाला, स्त्रियों के शोक तथा दुख  को दूर करने वाला है.

नीम या अन्य पत्तों का धूमन (धुंआ) – डेंगू को रोकने के लिए नीम,(निम्ब) कलामेघा, हरिद्रा (कर्कुमा लोंगा) और उशीरा का उपयोग करके हर्बल धूमन या धुआं किया जा सकता है। नीम का पेड़ भारत में बेहद उपयोगी माना गया है. इसके सूखे पत्ते लोग कपड़े रखने वाली जगह पर कीटनाशक के रूप में रखते हैं.

इसके अतिरिक्त किसी भी तरह के त्वचा त्वचा रोग में इसके काढ़े और लेप का प्रयोग किया जाता है. स्नान के दौरान इसकी पत्तियों का प्रयोग बेहद लाभकारी होता है. ये वातावरण को बेहतर करने में मदद करता है, जो वायरस को फैलने से रोकता है और मच्छरों को दूर भगाता है। इन धुएं में सांस लेना भी रोग की रोकथाम और इम्यूनसिस्टम को बढ़ाने का एक तरीका है।

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तुलसी – यह औषधीय पौधा कई घरों में मिल जाएगा तथा सामान्य सर्दी-खांसी से लेकर ज्वर इत्यादि में भी उपयोग किया जाता है. इसकी हर्बल चाय तो विश्व प्रसिद्ध है. यह वातावरण को शुद्ध करती है तथा बैक्टिरियल इन्फेक्शन को झट से खत्म करने वाली होती है. रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना इसका मौलिक गुण है.ये सांस की बीमारियों को दूर करने में मदद करती है. ये जड़ी बूटी संक्रमण से बचाने में मदद करती है. चिंता, तनाव और थकान जैसी स्थितियों में उपयोगी है. ये खांसी और बलगम से राहत दिलाने में मदद करती है. इस जड़ी बूटी में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं और डिटॉक्स करने में मदद करते हैं.

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षडंगा पनिया (Shadanga Paniya) – बुखार के लिए इस आयुर्वेदिक उपचार में 7 जड़ी बूटियों का मिश्रण है। इसमें पाथ्या (टर्मिनलिया चेबुला), अक्ष (टर्मिनलिया बेलेरिका), आंवला (एम्ब्लिका ऑफिसिनैलिस), कलामेघ ( एंड्रोग्राफिस पैनिकुलता), हल्दी (करकुमा लोंगा), नीम (अजादिराच्टा इंडिका) और गुडुची (टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया) शामिल हैं। आप 200 मिलीलीटर उबले पानी में 30 मिलीलीटर पथ्यशादंगम क्वाथ मिला सकते हैं और इसे समय-समय पर पीने से बुखार से राहत मिलती है।

हल्दी (हरिद्रा) – हल्दी भारत में सर्वाधिक मसालों में प्रयुक्त होने वाला प्रकंद है। त्वचा रोगों में, आर्थराइटिस, रक्तशोधक, आदि में इसका खूब प्रयोग होता है विश्वभर में कई प्रकार के कैंसर के इलाज में भी इसके प्रभावजनक परिणाम सामने आए हैं ।

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मुलहठी – मुलहठी के तने का प्रयोग अधिकतर किया जाता है. यह बलवर्धक, दृष्टिवर्धक, पौरुष शक्ति की वृद्धि करने वाली, वर्ण को आभायुक्त करने वाली, खांसी, स्वरभेद, व्रणरोपण तथा वातरक्त (गाउट) में अत्यंत उपयोगी होती है. इसका उपयोग पेप्टिक अल्सर के इलाज में किया जाता है. एसिडिटी के इलाज में तो यह बेहद कारगर है.

आंवला (आमलकी) – आंवले के फल को लगभग सभी आयुर्वेद की संहिताओं में रसायन कहा गया है. चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भाव प्रकाश, अष्टांग हृदय सभी शास्त्र आंवले को प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला मानते हैं. इसके अलावा आंवले को त्वचारोगहर, ज्वरनाशक, रक्तपित्त हर, अतिसार, प्रवाहिका, हृदय रोग आदि में बेहद लाभकारी माना गया है.

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आंवले में विटामिन सी, अमीनो एसिड, पेक्टिन जैसे पोषक तत्व होते हैं और ये एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है. इस जड़ी बूटी में एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी माइक्रोबियल, हेपेटोप्रोटेक्टिव और एंटीऑक्सीडेंट गुण जैसे उपचार गुण होते हैं. ये शरीर की इम्युनिटी को मजबूत करने में मदद करते हैं.आंवले का नियमित सेवन लंबी आयु की गारंटी भी देता है

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अश्वगंधा – अश्वगंधा का इस्तेमाल हजारों सालों से एक जड़ी बूटी के रूप में किया जाता रहा है. ये दर्द और सूजन को कम करने में मदद करती है. ये जड़ी बूटी एक एडाप्टोजेन है जो तनाव को कम करने और अनिद्रा को दूर करने में मदद करती है.

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डेंगू के लक्षण से बचाव तक से जाने सारी जानकारी

डेंगू बुखार के चकत्ते से अस्थायी राहत पाने के लिए आप चंदन और गुलाब जल से बने एक साधारण पेस्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरीके को आजमाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह ले लें। इनके अलावा उबले हुए पानी का सेवन, कंटेनरों पर ढक्कन लगाना, मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिए बर्तनों और बालकनियों से पुराना पानी निकालना और मच्छरदानी लगाकर सोना आदि बातों का विशेष ध्यान रखें।

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