Kashmiri Pandits Exodus History in Hindi | The Kashmir Files Movie | क्या है कश्मीरी पंडितो का इतिहास और पलायन की कहानी

हेल्थ
Kashmiri Pandit History
Kashmiri Pandit History

पिछले कुछ वर्षों से भारत में असहिष्णुता और डर का माहौल के बारे में हर कोई बात करने से पीछे नहीं रहता हैं. मगर क्या वास्तव में उस डर और जीवन से संघर्ष की दास्ताँ से उनका कभी वास्ता भी हुआ जो 1886 से जम्मू कश्मीर प्रान्त में कश्मीरी पंडितों ने सहा और आज तक अपने ही देश अपने ही घर में असहिष्णुता और डर के माहौल में जीने को मजबूर है।कश्मीरी पंडित सदियों से जिस भूमि पर बसते आए, जहाँ उनका घर परिवार, सुख सम्पति पुरखो की यादे सब कुछ था. सब मिलजुल कर एक खुशहाल जीवन जिया करते थे

Advertisement

यह भी पढ़े  : The Kashmir Files Review | कश्मीरी-हिंदुओं के दर्द के रिसते घावों के पन्ने

अचानक एक दिन उन्हें कट्टर इस्लामिक आंधी और आतंकवाद ने अपने ही देश,घर से पलायन के लिए मजबूर कर दिया उन्हें शरणार्थी बना दिया जिसमें प्रदेश की सरकार और राज्य का पूरा तंत्र भी शामिल हो गया.किसी ने भी कश्मीरी पंडितों की मदद नहीं की। और अब 32 सालो के बाद 2022 में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अमानवीय व्यवहार को बॉलीवुड की फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ में दर्शाया गया है.

इस मूवी को देखने के बाद ऐसा लगता है की यह मूवी (The Kashmir Files) हम सभी भारतीयों से सवाल पूछती है, की आज भी कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन के रहने पर मजबूर क्यों है । जिन आतंकवादियों ने सरे आम लोगो को मारा, महिलाओ के साथ बलात्कार किया, कश्मीरी पंडितो को वहां से भागने पर मजबूर किया वह इसी भारत के पूर्व प्रधान मंत्री से (17 february 2006) आखिर क्यों मिलता है .

क्या उन कश्मीरी पंडितों को कभी न्याय मिलेगा आखिर तब की सरकार क्यों मौन बैठी रही ऐसे ही अनेको सवाल पूछती है यह मूवी तो आइये आज के इस लेख में कश्मीरी पंडितों के इतिहास और इनके ऊपर बनी फिल्म (The Kashmir Files) के बारे में जानते हैं।

द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) की रिलीज़ के बाद से ही लोगो में इसको लेकर उत्सुकता बनी हुई है,की आखिर हमको 32 सालो से कश्मीरी पंडितो के दर्द तकलीफ और इतिहास से क्यों दूर रखा साथ ही 

यह भी पढ़े  : Vivek Ranjan Agnihotri Biography in Hindi, Age, Education, Career, Films | विवेक अग्निहोत्री की जिंदगी

Table of Contents

कश्मीरी पंडितो का दर्द जानने में हमको 32 कैसे लग गए ?

जो भी द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) मूवी को देख कर आ रहा है वह सभी से इस मूवी को देखने का आग्रह करता है। यह नरसंहार और पलायन कश्मीरी पंडितो के साथ ही नहीं बल्कि वहां रह रहे सिख,दलित, जैन, बौद्ध , सभी के साथ हुआ। एक लोकतांत्रिक देश की चुनी हुई सरकार, न्यायालय, पुलिस, सेना, मीडिया, तथा कथित बुद्धि जीवी किसी ने उनके लिए आवाज नहीं उठाई और सब आखे बंद करके देखते रहे वहां क्या हो रहा है

यह सभी को पता था।यह पूरी कहानी सिर्फ एक रात में तैयार नहीं हुयी थी इसके लिए सन1980,1986 के समय से तैयारीया होने लगी थी लेकिन इस बात से कश्मीरी पंडितो अनजान थे उन सभी को इस बात की जानकारी तब हुयी जब 19 जनवरी 1990 को कश्मीर के पंडितों को अपना घर छोड़ने का फरमान जारी हुआ .लेकिन इससे पहले जानते है की कौन है कश्मीरी पंडित,क्या थी इनकी कश्मीर में भूमिका और क्यों हुआ कश्मीरी पंडितो के लिए घर छोड़ने का फरमान जारी

कौन है कश्मीरी पंडित

देश के जम्मू कश्मीर में तीसरी सदी ईसा पूर्व से सारस्वत ब्राह्मणों का एक समूह यहाँ रहता आया हैं. पंच गौड़ समूह के ये ब्राह्मण हैं कई मामलों में देश के अन्य ब्राह्मण समूहों जैसे द्रविड़ आदि से इनमें काफी विभिन्नताएं हैं. ये एकमात्र कश्मीरी हिन्दू जाति एवं राज्य के मूल निवासी थे.

आजकल यह स्पष्ट नहीं है कि जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की संख्या कितनी थी और वर्तमान में कितने पंडित वहां आबाद हैं. इस सम्बन्ध में अलग अलग आकंडे हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ पलायन से पूर्व घाटी में करीब तीन लाख से छः लाख पंडित रहते थे. वर्ष 2016 में अब घाटी में रहने वाले पंडितों की संख्या एक से दो हजार के बीच मानी जाती हैं.

पूरे जम्मू कश्मीर प्रांत की जनसंख्या का महज ये पांच प्रतिशत थे. मगर इनमें पढ़े लिखे और समृद्ध लोगों की संख्या अधिक थी, राज्य की प्रशासनिक और अन्य विभागों के उच्च पदों पर पंडित थे.

हालांकि आज भी यानी कुछ समय पहले तक कोट के बाहर जनेऊ पहने वाले भी अपने आप को कश्मीरी पंडित कहते थे और द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)के रिलीज़ के बाद उन्ही लोगो ने कश्मीरी पंडितो के नरसंहार पर सवाल उठाये थे

कश्मीरी पंडितों और कश्मीर का इतिहास (Kashmiri Pandits – Historical Background in hindi)

  • आजादी से पहले कश्मीर एक बेहद ही सुंदर जगह होने के साथ-साथ, एक शांतिपूर्ण जगह भी हुआ करती थी और यहां की अधिकतर आबादी कश्मीरी पंडितों की थी. इस जगह पर दूसरे देशों के कई मुस्लिम राजाओं ने आक्रमण भी किया था और इस जगह पर राज्य भी किया था. 

यह भी पढ़े  : Shikara The untold story of Kashmiri Pandit’s

  • कश्मीर में रहने वाले कश्मीरी पंडितों की उस समय अलग-अलग श्रेणियां हुआ करती थी और इन श्रेणियों के आधार पर
  • इन पंडितों के अपने अलग-अलग रीति, रिवाज और परंपराएं हुआ करती थी.
  • कश्मीरी पंडित दो तरह के होते थे, जिनमें से पहली श्रेणी वाले पंडित को बनमासी (Banmasi) कहा जाता था. इस श्रेणी में उन पंडित को गिना जाता था जो मुस्लिम राजाओं के शासन के दौरान घाटी को छोड़कर चले गए थे और बाद में वापस यहां पर आकर फिर से बस गए थे.
  • वही दूसरी श्रेणी के पंडित को मलमासी (Malmasi) कहा जाता था. इस श्रेणी में उन पंडितों को रखा गया था जिन्होंने लाख दिक्कतों के बाद भी घाटी को नहीं छोड़ा था. इसके अलावा जिन पंडितों ने इस घाटी में व्यवसाय करना शुरू कर दिया था, उन्हें बुहिर पंडित कहा जाता था.

लेकिन आजादी के बाद इन पंडितों का नामों निशान इस जगह से खत्म होता गया और ये जन्नत आतंकवाद का शिकार हो गई.इस आतंकवाद (नरसंहार कांड) की पूरी जिम्मेदारी किसी पर डाली जाए तो वह है JKLF जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट . यह पाकिस्तान की इंटेलीजेंस और आर्मी के इशारों पर बना. 1977 में इस कट्टर इस्लामिक संगठन की स्थापना अमानुल्लाह ख़ान और मक़बूल भट्ट ने की, कुछ ही वर्षों बाद इंग्लैंड समेत कई देशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया और 1982 में इसने पाक अधिकृत कश्मीर से अपनी गतिविधियाँ शुरू की.

वर्ष 1987 में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट जेकेएलएफ़ ने भारतीय जम्मू & कश्मीर में अपनी शाखा खोली. यही से पंडितों के साथ अन्याय की शुरुआत हो गई जो अनवरत चलती रही

आतंकी संगठन  मानता था कश्मीर पर सिर्फ मुसलमानों का हक

आतंकी संगठन कश्मीर पर केवल मुस्लिम धर्म के लोगों का ही हक मानता था , जिसके चलते यहां पर रहने वाले अन्य धर्म के लोगों के लिए, इस जन्नत को उन्होंने नरक बना दिया था.
आतंकवादी कश्मीरी पंडितों को उनका धर्म बदलने के लिए दबाव डालने लगे. आतंकवादी चाहते थे कि कश्मीर में रहने वाले सभी पंडित मुस्लिम धर्म को अपना लें. जिससे की इस घाटी में केवल मुसलमानों का ही हक रहे.

जिन कश्मीरी पंडितों ने आतंकवादियों की इस बात को मान लिया और अपना धर्म बदल लिया था, उन्हें शातिपूर्व यहां पर रहने दिया गया. लेकिन जिन पंडितों ने अपना धर्म नहीं बदला और इस घाटी को नहीं छोड़ने का फैसला किया था, उनपर काफी सारे अत्याचार किए गए. जिसके चलते कई कश्मीरी पंडितों ने साल 1990 में इस राज्य को छोड़ दिया और भारत के अन्य राज्यों में जाकर बस गए.

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन की कहानी।

1986 में गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने बहनोई फारुख अब्दुल्ला से सत्ता छीन ली और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गये. खुद को सही ठहराने के लिए उन्होंने एक खतरनाक निर्णय लिया. ऐलान हुआ कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर भव्य शाह मस्जिद बनवाई जाएगी. तो लोगों ने प्रदर्शन किया. कि ये नहीं होगा. जवाब में कट्टरपंथियों ने नारा दे दिया कि इस्लाम खतरे में है.

यह भी पढ़े  : Srinagar The story of Kashmiri Pandits

इसके बाद कश्मीरी पंडितों पर धावा बोल दिया गया. साउथ कश्मीर और सोपोर में सबसे ज्यादा हमले हुए. जोर इस बात पर रहता था कि प्रॉपर्टी लूट ली जाए. हत्यायें और रेप तो बाई-प्रोडक्ट के रूप में की जाती थीं. नतीजन 12 मार्च 1986 को राज्यपाल जगमोहन ने शाह की सरकार को दंगे न रोक पाने की नाकामी के चलते बर्खास्त कर दिया.

Kashmiri Pandit History
Kashmiri Pandit History

1987 के विधानसभा चुनाव

वर्ष 1984 में गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने बहनोई फारुख अब्दुल्ला की सरकार गिरा दी. नेशनल कांफ्रेंस के 12 विधायकों के साथ इन्होने कांग्रेस से हाथ मिला लिया और खुद मुख्यमंत्री बन गये. दिल्ली में कांग्रेस की सरकार को राजीव गांधी लीड कर रहे थे.

कहते है गांधी शाह से खुश नहीं थे वे किसी तरह शाह की सरकार गिराना चाहते थे. राजीव गांधी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया और बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा दिया. केंद्र सरकार के इस निर्णय के बाद देशभर में कई दंगे हुए ऐसा ही एक दंगा अनंतनाग मे हुआ जहाँ मुस्लिम भीड़ ने अपना निशाना कश्मीरी पंडितों को बनाया.

केंद्र ने मौका पाकर राज्य में 7 मार्च, 1986 को राज्यपाल शासन लगा दिया और 1987 में विधानसभा चुनाव कराएं. इन चुनावों में फारुक अब्दूल्ला कांग्रेस के समर्थन के साथ राज्य के मुख्यमंत्री बने.

मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) का आगमन

जम्मू कश्मीर के 1987 के चुनावों का जिक्र यहाँ इसलिए जरूरी है क्योंकि कश्मीरी पंडितों के साथ 1990 में हुए नरसंहार के बड़े कारण में यह एक चुनाव भी था.

1987 में चुनाव हुए. कट्टरपंथी हार गये. पर कट्टरपंथियों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया. हर बात को इसी से जोड़ दिया कि इस्लाम खतरे में है. जुलाई 1988 में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट बना. कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए. कश्मीरियत अब सिर्फ मुसलमानों की रह गई. पंडितों की कश्मीरियत को भुला दिया गया.

14 सितंबर 1989 को भाजपा के नेता पंडित टीका लाल टपलू की जेकेएलएफ ने कई लोगों के सामने हत्या कर दी .हत्यारे पकड़ में नहीं आए. कट्टरपंथी लोगों ने उन्ही व्यक्तियों को पहले मारना शुरू किया जो समान में सम्मानित थे जिससे सभी में डर जन्म ले ले. ये कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाने को लेकर पहली हत्या थी.

इसके डेढ़ महीने बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या की गई. गंजू ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी. गंजू की पत्नी को किडनैप कर लिया गया. वो कभी नहीं मिलीं. वकील प्रेमनाथ भट को मार दिया गया. 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या की गई.

ये तो बड़े लोग थे. साधारण लोगों की हत्या की गिनती ही नहीं थी. इसी दौरान जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किये गये थे. क्यों? इसका जवाब नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार ने कभी नहीं दिया.

Kashmiri Pandits Exodus History in Hindi
Kashmiri Pandits Exodus History in Hindi

4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें. अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबारा छापा. चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित यहां से चले जाएं, नहीं तो बुरा होगा. इसके बाद लोग लगातार हत्यायें औऱ रेप करने लगे. कहते कि पंडितो, यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ – असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान (हमें पाकिस्तान चाहिए. पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ.)

गिरजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ. फिर मार दिया गया. ऐसी ही अनेक घटनाएं हुईं. पर उनका रिकॉर्ड नहीं रहा. किस्सों में रह गईं. एक आतंकवादी बिट्टा कराटे ने अकेले 20 लोगों को मारा था. इस बात को वो बड़े घमंड से सुनाया करता. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट इन सारी घटनाओं में सबसे आगे था.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 60 हजार परिवार कश्मीर छोड़कर भाग गये. उन्हें आस-पास के राज्यों में जगह मिली जान बचाने की. कहीं कोई इंतजाम नहीं था. 19 जनवरी 1990 को सबसे ज्यादा लोगों ने कश्मीर छोड़ा था. लगभग 4 लाख लोग विस्थापित हुए थे. हालांकि आंकड़ों के मुताबिक अभी लगभग 20 हजार पंडित कश्मीर में रहते हैं.

19 जनवरी 1990 को घाटी में सेना

19 जनवरी 1990 को नवनियुक्त राज्यपाल जगमोहन घाटी में सेना बुलाते हैं इस एक कदम ने लाखों कश्मीरी पंडितों को जीवित कश्मीर छोड़ने का एक विकल्प दिया. सेना पंडितों के साथ हो रहे अन्याय को रोक तो नहीं पाई मगर उन्हें कश्मीर छोड़ने में ढाल की तरह मददगार साबित हुई.घाटी में सेना के दाखिले के बाद जत्थों में लोगों ने घाटी को खाली करना शुरू कर दिया. कुछ ने जम्मू में शरण ली तो अधिकतर ने दिल्ली हरियाणा, पंजाब और देश के अन्य भागों में जाना उचित समझा.

पंडितों पर हो रहे हमलें वही नहीं थमे जहाँ भी कश्मीरी पंडित दिखता भीड़ में लोगों द्वारा उस पर हमला कर दिया जाता था. 1989-1990 के एक साल की अवधि में करीब 400 से 500 पंडितों को मार दिया गया.

अंजाम भुगतो या फिर इस्लाम अपनाओ’साल 1990 में कश्मीरी पंडितो को दी गई चेतावनी

19 जनवरी 1990 शुक्रवार की सुबह डल झील पर शिकारा का संगीत नहीं, मुस्लिम कट्टरपंथियों का शोर सुनाई पड़ रहा था. हिंदुओं के घरों की दीवारों पर धमकी भरे पोस्टर लगा दिए गए थे. कश्मीर के कोने-कोने में मस्जिदों से फरमान जारी किए जा रहे थे. फरमान कश्मीर में रहने वाले गैर-मुस्लिमों के खिलाफ.

गैर-मुस्लिमों (Kashmiri Pandits)के खिलाफ. फरमान

राज्य में भय और दहशत का माहौल था न कानून न पुलिस न सरकार. आतंकवादियों के हाथों लोगों के कत्ल हो रहे थे लड़कियों और औरतों के सामूहिक बलात्कार के बाद मार दिया जाता. जिहादी इस्लामिक ताकतों ने कश्मीरी पंडितो को तीन विकल्प दिए, अपना धर्म बदल लो, पलायन करलो या मरो.

कश्मीरी पंडितों के घरों में दाखिल हो जाती भीड़

हथियार लहराती हुई भीड़ अल्लाहु अकबर के नारों के साथ अचानक कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandits) के घरों में दाखिल हो जाती और उन्हें धमकाती थी. मुस्लिम कट्टरपंथियों ने गैर-मुस्लिमों के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी, जिसमें उनके पास दो ही विकल्प थे- या तो कश्मीर छोड़ो या फिर दुनिया.

1990 के बाद भी घाटी में जो कुछ पंडित बच कर रह गये थे उन पर निरंतर हमले होते रहे और जाने जाती रही. कुछ बड़े पंडितों पर 1990 बाद हुए नरसंहार ये थे.

  • डोडा नरसंहार- अगस्त 14, 1993 को 15 पंडितों की हत्या
  • संग्रामपुर नरसंहार- मार्च 21, 1997 घर में घुसकर सात पंडितों की हत्या
  • वंधामा नरसंहार- जनवरी 25, 1998 आतंकियो ने 4 परिवारों के 23 जनों की हत्या की
  • पठानकोट नरसंहार- अप्रैल 17, 1998 को एक परिवार के 27 लोगों की हत्या, जिसमें 11 बच्चें थे.
  • 2000 में अनंतनाग के पहलगाम में 30 अमरनाथ यात्रियों की हत्या
  • 20 मार्च 2000 चित्ती सिंघपोरा नरसंहार में 36 सिखों की हत्या
  • 2001 में डोडा में 6 हिंदुओं की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी
  • 2001 जम्मू कश्मीर रेलवे स्टेशन नरसंहार में 11 लोगों की हत्या हुई
  • 2002 में जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर दो बार हमला 15 लोगों की मौत
  • 2002 क्वासिम नगर नरसंहार, 29 हिन्दू मजदूरों की हत्या जिनमें 13 स्त्रियाँ व एक बच्चा भी था.
  • 2003 नदिमार्ग नरसंहार में 24 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया.

सरकार रही नाकाम (Government Role)

जब कश्मीरी पंडितों के साथ ये अत्याचार हो रहे थे, तो उस वक्त केंद्र में वी. पी. सिंह की सरकार थी और राज्य में फारुख उबदूला की सरकार थी. लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों में से किसी ने भी कश्मीरी पंडितों की किसी भी तरह से मदद नहीं की.

कश्मीरी पंडितों के पलायन के समय किसकी सरकार थी (Whose government was there at the time of the exodus of Kashmiri Pandits?)

जब जम्मू कश्मीर में मृत्यु का यह तांडव चल रहा था इस समय प्रदेश में नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे केंद्र में वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे. प्रदेश में हालात इस कद्र बिगड़ गये अथवा राज्याश्रय में बिगाड़ दिए गये कि बाद में राज्यपाल शासन लगाना पड़ा और घाटी में सेना बुलानी पड़ी.

कश्मीरी पंडितों का पलायन व आंकड़े (Exodus and statistics of Kashmiri Pandits)

सरकारी आंकड़ों के अनुसार घाटी में बसनें वाले करीब 60 परिवारों को घर छोड़कर जान बचाने के लिए पलायन करना पड़ा था. इस घटनाक्रम में करीब 4 लाख लोगों ने विस्थापन किया और पिछले 32 वर्षों से अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं.

90 के बाद आई कई सरकारों ने इनके पुनर्वास को लेकर राजनैतिक रोटियां तो सेकी मगर पंडितों के दर्द पर मरहम अभी तक किसी ने नहीं लगाया. मोदी सरकार से भी कश्मीरी पंडितों को बड़ी उम्मीद हैं. धारा 370 और 35A के हटने के बाद पंडितों को उम्मीद है कि सरकार उन्हें फिर से अपने प्रदेश में बसाएगी.

दिग्विजय सिंह द्वारा संसद में साल 1990 और उसके बाद कश्मीरी पंडितों के पलायन के सवाल पर भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस पर जानकारी देते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर की सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार 44684 कश्मीरी विस्थापित परिवार ‘राहत और पुनर्वास आयुक्त (विस्थापित) जम्मू’ के कार्यालय में रजिस्टर्ड हैं मगर इनकी संख्या की बात करे तो यह 154712 व्यक्ति हैं.

हाल ही (साल 2021 ) में कश्मीरी पंडितों पर हुए हमले Recent Attacks On Kashmiri pandits

साल 2021 के अक्टूबर माह में एक बार फिर कश्मीरी पंडितों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बीच भय और पलायन का माहौल बन रहा हैं. इस परिस्थिति की भूमिका में हाल ही में पंडितों पर कुछ कुछ जानलेवा हमले हैं. पिछले दो दिनों में घाटी से 150 से अधिक अल्पसंख्यक परिवारों ने घाटी छोड़कर जम्मू में शरण ली हैं.

सात अक्टूबर को एक गर्वनमेंट स्कूल के दो टीचर दीपक चंद और प्रधानाचार्या सतिन्द्र कौर की गोली मारकर हत्या कर दी थी, इस घटना से पूर्व श्रीनगर के विख्यात केमिस्ट माखनलाल बिंदु की भी गोली मारकर हत्या कर दी थी. इन घटनाओं को देखकर एक बार पुनः पंडितों में 90 के दौर के भय और आतंक की यादे ताजा हो रही हैं.

इस समय कश्मीर में पंडितों के हालात (Rehabilitation of Kashmiri Pandits)

इस वक्त कश्मीर में ना के समान कश्मीरी पंडितों बचे हुए हैं. लेकिन सरकार दोबारा से घाटी में इन्हें बसाने की कोशिश करने में लगी हुई है. साल 2008 में यूपीए सरकार ने इनको दोबारा से बसाने के लिए 1,168 करोड़ के पैकेज का ऐलान किया था. जिसके बाद करीब 1000 की संख्या में कश्मीरी पंडित वापस से घाटी में आकर बसे हैं.

The Kashmir Files Review कश्मीरी-हिंदुओं के दर्द के रिसते घावों के पन्ने
The Kashmir Files

कश्मीरी पंडितों की नरसंहार पर बनी फिल्म द कश्मीर फाइल्स’2022 (‘The Kashmir Files’ Film Story)

हालही में 11 मार्च के दिन फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ रिलीज़ हुई है. इस फिल्म के रिलीज़ होने के साथ ही इस फिल्म ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. हालही ये फिल्म अपनी रिलीज़ के पहले ही कई विवादों के चलते चर्चाओं में रही है. इस फिल्म में विवेक अग्निहोत्री ने कश्मीर हिन्दू पंडितों के साथ 1990 के दशक में हुए नरसंहार (अत्याचार) पर एक दर्दनाक कहानी को कई तथ्यों के साथ दर्शाया है . फिल्म में पंडितों के साथ घटित सत्य घटनाओं और उस समय के हालातों को चित्रित करने का प्रयास किया हैं.

देश और दुनियां भर से फिल्म को बेहद प्यार मिला और बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म छाई रही.कोरोनाकाल के बाद कोई ब्लॉकबस्टर फिल्म आई है तो यदि है. इस फिल्म में आपको मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खैर, पल्लवी जोशी, दर्शन कुमार, चिन्मय मंडलेकर, पुनीत इस्सर एवं मृणाल कुलकर्णी आदि अभिनेताओं ने अभिनय किया है. इस फिल्म का निर्देशन विवेक अग्निहोत्री ने किया है, और सिनेमेटोग्राफी उदयसिंह मोहिते द्वारा की गई है.

इसे अभिषेक अग्रवाल आर्ट्स के प्रोडक्शन हाउस द्वारा बनाया गया है. यह फिल्म इस साल के गणतंत्र दिवस के दिन रिलीज़ होने वाली थी, किन्तु कोरोना के बढ़ते केस के चलते यह फिल्म की रिलीज़ डेट को आगे बढ़ाना पड़ा. किन्तु अब जाकर जब यह फिल्म रिलीज़ हुई है. तो यह फिल्म रिकॉर्ड तोड़ कमाई कर रही है. फिल्म रिलीज़ के 5 दिन बाद भी सिनेमाघर हाउसफुल जा रहे हैं.

फिल्म को बॉलीवुड के बायकाट और बड़े बड़े रियलिटी शो में प्रमोशन करने से भी रोका गया मगर भारतीय जनमानस ने पंडितों के दर्द की सच्ची दास्ताँ देखकर इसे भरपूर प्यार दिया और साल की सबसे हिट फिल्म भी बनाया हैं.

विवेक रंजन अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri ) जी ने कहा है की द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) फिल्म पर बहुत जल्द वेब सीरीज (web Series) भी देखने को मिलेगी जिसमे घाटी में हुए कश्मीरी पंडितो के नरसंहार की एक एक कहानी को दिखाया जायेगा

पिछले तीस वर्षों में कश्मीरी पंडितों को भले ही न्याय तो नहीं मिल पाया हो, मगर पहली बार दुनियां ने उनके दर्द को जाना हैं उनकी असली कहानी पहली बार उन लोगों ने भी जानी है जो कश्मीरी पंडित है तथा इस त्रासदी के बाद भारत या दुनियां के अन्य भागों में हैं.

जालीम फारूक अहमद डार (Farooq Ahmed Dar) उर्फ बिट्टा कराटेका वीडियो

‘द कश्मीर फाइल्स’ में जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के आतंकवादी फारूक अहमद डार (Farooq Ahmed Dar) उर्फ बिट्टा कराटे का इंटरव्यू भी है। जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) का यह आतंकी ‘कश्मीरी पंडितों का कसाई (Butcher of Kashmiri Pandits)’ भी कहा जाता है। यह वही बिट्टा कराटे है जिसने कई कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया था और उफ्फ तक नहीं निकली।

बिट्टा कराटे (Bitta Karate) ने कैमरे पर 20 कश्मीरी पंडितों की हत्या की बात कबूली थी। उसने दावा किया था कि उसका निशाना कभी नहीं चूकता था। अब अपने टारगेट के सिर या दिल में ही गोली मारता था। पत्रकार राहुल पंडिता ने एक लेख में उसका जिक्र करते हुए लिखा था: जेकेएलएफ का हत्यारा पिस्तौल लेकर श्रीनगर में घूमता और पंडितों की गंध (बट्ट-ए-मुश्क) खोजता था ताकि उन्हें खोज कर मार सके।

बिट्टा ने एक इंटरव्यू पत्रकार मनोज रघुवंशी को दिया था। इसमें उसने बताया था कि सबसे पहले उसने सतीश कुमार टिक्कू को मारा था क्योंकि वह आरएसएस से जुड़े थे। रघुवंशी ने उससे पूछा था: सबसे पहला व्यक्ति, जिसे मारा वो कौन था? बिट्टा ने कुछ देर सोचने के बाद जबाव दिया​: सतीश कुमार टिक्कू, पंडित था वो। मैंने उसे इसलिए मारा क्योंकि वो आरएसएस से जुड़ा हुआ था। ऊपर से उसे मारने का ऑर्डर मिला था।

इस इंटरव्यू के दौरान ही बिट्टा ने कहा था कि उसे मारने के ऑर्डर ऊपर से मिलते थे। साथ ही बताया था कि वह पिस्टल से हत्या करता था। एके-47 के इस्तेमाल को लेकर पूछे जाने पर कहा था कि इससे जवानों पर फायरिंग करता था। उसने यह भी बताया था कि वह अकेले ही हत्याएँ करता था और वो भी बिना नकाब के। रघुवंशी को दिया गया बिट्टा का इंटरव्यू आप नीचे सुन सकते हैं;

कहां है बिट्टा कराटे?

मिली जानकारी के मुताबिक, बिट्टा कराटे जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट का चेयरमैन है। 1990 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के बाद बिट्टा कटारे राजनीति की दुनिया में उतर गया था।राजनीति में आने से पहले दिए एक इंटरव्यू में बिट्टा कटारे ने नरसंहार को लेकर सारे आरोप कबूले थे, लेकिन बाद में वह पलट गया।कहा जाता है की कभी बिट्टा कराटे और यासीन मलिक की गहरी जमती थी। बाद में दोनों के बीच विवाद हो गया और जेकेएलएफ भी दो हिस्सों में बँट गया। फिलहाल बिट्टा कराटे और यासीन मलिक दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं।

FAQ

Q : कश्मीर में कितने पंडित मारे गए थे?

Ans : पिछले 17 सालों (1990-2007) में हुए आतंकि हमलों में 399 पंडित मारे गए है।

Q : कश्मीर फाइल्स फिल्म कब रिलीज़ हुई है ?

Ans : 11 मार्च

कश्मीरी पंडितों पर लिखी गई किताब (Books Details)

कश्मीरी पंडितों के साथ जो साल 1990 में हुआ था, उस विषय पर कई सारी किताबें भी लिखी गई है और इन किताबों में इनके इतिहास और इन पर हुए अत्याचारों की जिक्र किया गया है. इन पंडितों पर लिखी गई कुछ किताबों के नाम इस प्रकार हैं,

  • ‘माय फ्रोजेन टरबुलेन्स इन कश्मीर’ – ये किताब जगमोहन द्वारा लिखी गई है. इस किताब में साल 1990 की घटनाओं का जिक्र किया गया है और बताया गया है कि किस तरह से आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को उनके घरों को छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.
  • कल्चर एंड पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ़ कश्मीर’– इस किताब में भी कश्मीरी पंडितों के बारे में बताया गया है. ये किताब पीएनके बामजई ने लिखा है और उन्होंने भी कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्यायों की जिक्र अपनी इस किताब में किया है.
    “आवर मून हेज ब्लड क्लॉट्स” – ये किताब राहुल पंडिता ने लिखा है, जो कि खुद एक कश्मीरी पंडित है. इन्होंने अपनी इस किताब में अपने परिवार की कहानी के माध्यम से कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों की कहानी बताई है.

निष्कर्ष-

कश्मीरी पंडितों के साथ अपने ही देश में काफी अन्याय हुए हैं और आज भी उनका यहदुखा कम नहीं हुआ है हालांकि सरकार अब इन कश्मीरी पंडितों को वापस से इनका हक दिलवाने की कोशिशें करने में लगी हुई है. लेकिन सरकार की अनेको कोशिशों के बावजूद भी इन कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय को भुलाया नहीं जा सकता है. हम सभी को मिलकर सर्कार और कश्मीरी पंडितों का सहयोग करना चाहिए जिससे उन्हें भी उनका हक ( कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो सके ) मिल सके

उम्मीद करती हूँ की आप सभी पाठको को (Kashmiri Pandits Exodus History in Hindi | The Kashmir Files Movie | Kashmiri Pandit History In Hindi |  कश्मीरी पंडित कौन थे | क्या है कश्मीरी पंडितो का इतिहास और पलायन की कहानी) इनका इतिहास  का यह लेख पसंद आया होगा. यदि आपको कश्मीरी पंडितों के बारें में दी जानकारी पसंद आई हो तो इसे अन्य लोगो के साथ भी शेयर करें. इस विषय पर आपकी कोई राय हो तो कमेंट के माध्यम से साझा करे

Leave a Reply