प्रदोष व्रत तिथि महत्व कथा पूजा विधि एवं प्रदोष व्रत उद्यापन | Pradosh Vrat Dates, Vidhi & Katha in hindi

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Pradosh Vrat Dates, Vidhi, Katha & Puja Timings in hindi
Pradosh Vrat Dates, Vidhi, Katha & Puja Timings in hindi

Pradosh Vrat: हिन्दू धर्म के अनुसार हर व्रत का अपना अलग ही महत्व है, हर एक व्रत के पीछें अपनी एक कथा और उसका सार है. लोग अपनी मान्यता या श्रध्दा के अनुसार व्रत को करते है. उन सब में से एक है प्रदोष व्रत. प्रदोष व्रत भगवान शिव के कई व्रतो मे से एक है जो कि, बहुत फलदायक माना जाता है. इस व्रत को कोई भी स्त्री जो अपनी मनोकामना पूरी करना चाहती है कर सकती है.

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Pradosh Vrat : प्रदोष व्रत तिथि महत्व कथा पूजा विधि एवं प्रदोष व्रत उद्यापन | Pradosh Vrat Dates, Vidhi, Katha & Puja Timings in hindi

Table of Contents

  • प्रदोष व्रत क्या है? (What is Pradosh vrat )
  • प्रदोष व्रत का महत्व (Pradosh Vrat significance)
  • प्रदोष व्रत की पूजा विधि (Pradosh Vrat Puja Vidhi )
  • प्रदोष व्रत की कथा तथा फल (Pradosh Vrat puja Katha and Story)
  • प्रदोष व्रत उद्ध्यापन की पूजा विधी (Pradosh Vrat udyapan puja vidhi)
  • प्रदोष व्रत 2021 के अनुसार तिथि व पूजा का समय (Pradosh vrat 2021date and time)

प्रदोष व्रत क्या है? (What is Pradosh vrat )

प्रदोष व्रत या प्रदोषम प्रदोष काल में किया जाता है. इसका अर्थ है, सूर्यास्त के बाद तथा रात्रि का सबसे पहला पहर, जिसे सायंकाल कहा जाता है . उस सायंकाल या तीसरे पहर के समय को ही प्रदोष काल कहा जाता है. इस व्रत को कोई भी स्त्री जो अपनी मनोकामना पूरी करना चाहती है भगवान शिव की आराधना कर कर सकती है.

प्रदोष व्रत की पूजा विधि (Pradosh Vrat Puja Vidhi )

प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा की जाती है.हर माह त्रयोदशी तिथि को प्रातः उठकर स्नानादि करने के बाद दीप प्रज्वलित करें और व्रत का संकल्प लें. यह व्रत निर्जल अर्थात् बिना पानी के किया जाता है .इस दिन पूरा दिन व्रत करने के बाद प्रदोष काल में किसी मंदिर में जाकर पूजन करना चाहिए.

अगर मंदिर जाना संभव न हो तो घर में ही मंदिर या स्वच्छ स्थान पर शिवलिंग स्थापित करके पूर्व दिशा में मुह कर भगवान की पूजा करें. पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद, घी व गंगाजल से अभिषेक करें. धूप-दीप फल-फूल, नैवेद्य आदि से विधिवत पूजन करें. पूजन और अभिषेक के दौरान शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र नमः शिवाय का जाप अवश्य करें.

सबसे पहले दीपक जलाकर उसका पूजन करे.

सर्वपूज्य भगवान गणेश का पूजन करे.
तदुपरान्त शिव जी की प्रतिमा को जल, दूध, पंचामृत से स्नानादि कराए . बिलपत्र, पुष्प , पूजा सामग्री से पूजन कर भोग लगाये .

प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करनेवाला होता है.सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि प्रदोष काल (सायं काल) के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं.

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जो भी व्‍यक्ति अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं. प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है. भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित इस व्रत को प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को रखा जाता है

एकादशी की तरह ही प्रदोष का व्रत भी हर महीने में दो बार त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है. ये व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है. सप्ताह के अलग अलग दिन के हिसाब से व्रत का महत्व और उद्देश्य है. सामान्यतय कर्ज से मुक्ति दिलाने और स्वास्थ्य संबन्धी परेशानियों को दूर करने के लिए प्रदोष का व्रत रखा जाता है.

शास्त्रों में प्रदोष व्रत को रखने के तमाम लाभ बताए गए हैं. मान्यता है कि इसे रखने से दो गायों को दान करने का पुण्य प्राप्त होता है. लेकिन प्रदोष का व्रत एक बार में 11 या 26 प्रदोष तक ही रखा जाता है. इसके बाद उद्यापन कर देना चाहिए तभी इसका लाभ मिल पाता है.

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हर दिन के प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्व और उद्देश्य

शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार हर दिन के प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्व है। सोमवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष कहा जाता है। इस दिन किए जाने वाले व्रत से भक्तों को इच्छा के अनुसार फल प्राप्त होता है। मंगलवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है। वहीं बुधवार के दिन प्रदोष व्रत पड़ने से इसे सौम्यवारा प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह प्रदोष व्रत ज्ञान और विद्या की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

इसके अलावा गुरुवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को गुरुवारा प्रदोष व्रत कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से शत्रुओं से छुटकारा मिलता है। शुक्रवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत भृगुवारा प्रदोष कहलाता है। इस दिन व्रत रखने से धन-वैभव और सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।

वहीं शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत शनि प्रदोष कहलाता है। इसे नौकरी में उन्नति पाने के लिए किया जाता है। साथ ही साथ रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भानु प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से जीवन में सुख-शांति और लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है।

प्रदोष व्रत का महत्व (Pradosh Vrat significance)

कई जगह मान्यता व श्रध्दा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते है. कहा जाता है इस व्रत से, कई दोष की मुक्ति तथा संकटों का निवारण होता है. यह व्रत साप्ताहिक महत्व भी रखता है .

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प्रदोष व्रत के उद्यापन का तरीका

  • प्रदोष व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का उद्यापन त्रयोदशी तिथि पर ही करना चाहिए।
  • प्रदोष व्रत के उद्यापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है।
  • रात्रि में कीर्तन-भजन करते हुए जागरण किया जाता है।
  • त्रयोदशी के दिन स्नानादि करके , साफ़ व कोरे वस्त्र पहने.
  • रंगीन वस्त्रो से भगवान की चौकी को सजाये.
  • उस चौकी पर प्रथम पूज्य भगवान गणेशजी की प्रतिमा रख, शिव-पार्वती की प्रतिमा रखे और विधी विधान से पूजा करे.
  • पूजा मे नेवेध लगा कर हवन भी करे.
  • प्रदोष व्रत के हवन में पुराणों के अनुसार दिये मंत्र ॐ उमा सहित-शिवाये नम: .मंत्र का कम से कम 108, बार यानी एक माला जाप करते हुए हवन किया जाता है।
  • प्रदोष व्रत उद्यापन के हवन में खीर का प्रयोग किया जाता है।
  • हवन पूरा होने के बाद पुरे भक्तिभाव से भगवान शिव की आरती की जाती है।इसके बाद ब्रह्माणों (पुरोहित ) को भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा दी जाती है। अन्त में पुरे परिवार के साथ भगवान शिव और ब्रह्माणों (पुरोहितों) का आशीर्वाद लेकर प्रसादी ग्रहण करे.

प्रदोष व्रत की कथा तथा फल (Pradosh Vrat puja Katha and Story)

प्राचीन काल में एक गरीब पुजारी हुआ करता था. उस पुजारी की मृत्यु के बाद, उसकी विधवा पत्नी अपने पुत्र को लेकर भरण-पोषण के लिए भीख मांगते हुए, शाम तक घर वापस आती थी. एक दिन उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटकने लगा था. उसकी यह हालत पुजारी की पत्नी से देखी नही गई, वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और पुत्र जैसा रखने लगी.

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई . वहा उसने ऋषि से शिव जी के इस प्रदोष व्रत की कथा व विधी सुनी , घर जाकर अब वह प्रदोष व्रत करने लगी . दोनों बालक वन में घूम रहे थे, उसमे से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया, परन्तु राजकुमार वन में ही रहा . उस राजकुमार ने गन्धर्व कन्याओ को क्रीडा करते हुए देख, उनसे बात करने लगा . उस कन्या का नाम अंशुमती था . उस दिन वह राजकुमार घर भी देरी से लोटा.

दुसरे दिन फिर से राजकुमार उसी जगह पंहुचा, जहा अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी. तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उससे कहा की आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार हो ना, आपका नाम धर्मगुप्त है.

अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिव जी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है , क्या आप इस विवाह के लिए तैयार है?

राजकुमार ने अपनी स्वीक्रति दी और उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ. बाद में राजकुमार ने गन्धर्व की विशाल सेना के साथ विदर्भ पर हमला किया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगे.

वहा उस महल में वह उस पुजारी की पत्नी और पुत्र को आदर के साथ ले जाकर रखने लगे . उनके सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई और सुख से जीवन व्यतीत करने लगे.

एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातो के पीछे का रहस्य पूछा . तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी बात और प्रदोष व्रत का महत्व और प्रदोष व्रत से प्राप्त फल से अवगत कराया.

उसी दिन से समाज में प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया तथा मान्यतानुसार लोग यह व्रत करने लगे.

बुध प्रदोष व्रत कथा

बुध प्रदोष व्रत की कथा के अनुसार, एक पुरुष का नया-नया विवाह हुआ। विवाह के 2 दिनों बाद उसकी पत्‍नी मायके चली गई। कुछ दिनों के बाद वह पुरुष पत्‍नी को लेने उसके यहां गया। बुधवार को जब वह पत्‍नी के साथ लौटने लगा तो ससुराल पक्ष ने उसे रोकने का प्रयत्‍न किया कि विदाई के लिए बुधवार शुभ नहीं होता।

लेकिन वह नहीं माना और पत्‍नी के साथ चल पड़ा। नगर के बाहर पहुंचने पर पत्‍नी को प्यास लगी। पुरुष लोटा लेकर पानी की तलाश में चल पड़ा। पत्‍नी एक पेड़ के नीचे बैठ गई। थोड़ी देर बाद पुरुष पानी लेकर वापस लौटा, तब उसने देखा कि उसकी पत्‍नी किसी के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही है और उसके लोटे से पानी पी रही है। उसको क्रोध आ गया।

वह निकट पहुंचा तो उसके आश्‍चर्य का कोई ठिकाना न रहा, क्योंकि उस आदमी की सूरत उसी की भांति थी। पत्‍नी भी सोच में पड़ गई। दोनों पुरुष झगड़ने लगे। भीड़ इकट्ठी हो गई। सिपाही आ गए। हमशक्ल आदमियों को देख वे भी आश्‍चर्य में पड़ गए। उन्होंने स्त्री से पूछा ‘उसका पति कौन है?’ वह कर्तव्यविमूढ़ हो गई।

तब वह पुरुष शंकर भगवान से प्रार्थना करने लगा- ‘हे भगवान! हमारी रक्षा करें। मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने सास-ससुर की बात नहीं मानी और बुधवार को पत्‍नी को विदा करा लिया। मैं भविष्य में ऐसा कदापि नहीं करूंगा।’जैसे ही उसकी प्रार्थना पूरी हुई, दूसरा पुरुष अंतर्ध्यान हो गया। पति-पत्‍नी सकुशल अपने घर पहुंच गए। उस दिन के बाद से पति-पत्‍नी नियमपूर्वक बुध त्रयोदशी प्रदोष का व्रत रखने लगे।

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कब मनाई जाती हैं ?

“ प्रदोष व्रत प्रत्येक पक्ष (कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष) की त्रयोदशी को किया जाता है. ”

प्रदोष व्रत में दान

शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार प्रदोष व्रत में लोहा, तिल, काली उड़द, शकरकंद, मूली, कंबल, जूता और कोयला आदि चीजों का दान करने से शनि से मुक्ति मिलती है

प्रदोष व्रत कब से शुरू करें

पुत्र कामना के लिए – अगर आप पुत्र प्राप्ति के लिए प्रदोष व्रत रखने की सोच रहे हैं, तो बता दें कि भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा पाने के लिए ये व्रत शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से शुरू करना चाहिए. और वो भी तब जब उस दिन शनिवार पड़े. अर्थात शुक्ल पक्ष का शनि प्रदोष व्रत से व्रत की शुरुआत करें.

रोगों से मुक्ति पाने के लिए – किसी लंबी बीमारी से जूझ रहे हैं और उससे जीवनभर के लिए मुक्ति पाना चाहते हैं तो भगवान शिव के प्रदोष व्रत की शुरुआत रवि प्रदोष व्रत से करें.

सुख–समृद्धि और सुयोग्य जीवनसाथी के लिए – जीवन में सुख-समृद्धि के साथ-साथ सुंदर, सुयोग्य जीवनसाथी की मनोकामना रखने वाले व्यक्ति को शुक्र प्रदोष व्रत से ही प्रदोष व्रत की शुरुआत करनी चाहिए.

आर्थिक तंगी और कर्ज से छुटकारा पाने के लिए – अगर मां लक्ष्मी आपसे रूठ गई है और कर्ज से छुटकारा पाना चाहते हैं तो ये व्रत सोम प्रदोष व्रत से शुरू करना चाहिए.

ध्यान देने योग्य तथ्य : प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग हो सकते हैं। चूँकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय, त्रयोदशी के प्रबल होने पर निर्भर करता है। तथा दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनो शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी अलग-अलग हो सकता है।

इसीलिए कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि, प्रदोष व्रत त्रयोदशी से एक दिन पूर्व अर्थात द्वादशी तिथि के दिन ही हो जाता है।सूर्यास्त होने का समय सभी शहरों के लिए अलग-अलग होता है अतः प्रदोष व्रत करने से पूर्व अपने शहर का सूर्यास्त समय अवश्य जाँच लें

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FAQ:

Q: प्रदोष व्रत की पूजा कब करनी चाहिए?
Ans:सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक का समय इस समय में भगवान शिव की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

Q: प्रदोष में क्या न करें?
Ans: भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा किए बिना भोजन ग्रहण न करें.व्रत के समय में अन्न, नमक, मिर्च आदि का सेवन नहीं करें।

Q: प्रदोष व्रत मे पूजा की थाली में क्या-क्या रखें?
Ans: पूजा की थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र, शमी पत्र, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती एवं फल के साथ पूजा करें।

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