Pt Madan Mohan Malviya​ : महामना मदन मोहन मालवीय की रोचक बातें, जानकार गर्व करेंगे आप

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Madan Mohan Malaviya:madan mohan malviyas death anniversary
Madan Mohan Malaviya:madan mohan malviyas death anniversary

Pt Madan Mohan Malviya​ : महामना मदन मोहन मालवीय की रोचक बातें, जानकार गर्व करेंगे आप
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Pt Madan Mohan Malviya​ : भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास की हलचल, राजनीति की उथल पुथल, विज्ञान के आविष्कार, नवीन विश्व के निर्माण की प्रक्रिया और शिक्षा को नए मकाम पर ले जाने वाले ‘महामना’ सेजुडी है 12 नवंबर की तारीख। इस दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक और भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय का वाराणसी में निधन हुआ था

पंडित मदन मोहन मालवीय (Madan Mohan Malaviya) उन्होंने सम्मान पूर्वक महामना भी कहा जाता है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्थापक रहे. 12 नवंबर को महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, पत्रकार और वकील रहे मदन मोहन मालवीय की पुण्यतिथि पर देश उन्हें याद कर रहा है.


बचपन से कविता लिखने का शौक

पंडित मदन मोहन मालवीय ने हमेशा ही देश के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही समाज के उत्थान के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हुए सभी का दिल जीतने वाले कार्य किया. उनका जन्म इलाहाबाद के एक साधारण परिवार में 25 दिसंबर 1861 को हुआ था. उनके पिता का नाम ब्रजनाथ और मां का नाम भूनादेवी था. शुरुआती शिक्षा इलाहबाद में करने के बाद पंडित जी ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बीए की शिक्षा पूरी की. बचपन से ही उन्हें कविता लिखने का शौक था. पत्रिकाओं में उनकी कविताएं मार्कंड नाम से छपा करती थीं.

​महामना मदन मोहन मालवीय : एक परिचय

  • इलाहाबाद में 25 दिसंबर, 1861 में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपने महान कार्यों के चलते ‘महामना’ कहलाए।
  • मालवीय ने अपना करियर इलाहाबाद जिला विद्यालय में एक शिक्षक के रूप में शुरू किया।
  • महामना मदन मोहन मालवीय शिक्षाविद् थे। उन्होंने 1915 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना की।
  • मालवीय ने एलएलबी करके पहले जिला अदालत और उसके बाद 1893 इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत की।
  • 1885 से 1907 के बीच तीन पत्रों- हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन और अभ्युदय का संपादन किया।
  • ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ के बीच कड़ी का काम करते हुए स्वतंत्रता संग्राम के पथप्रदर्शकों में से एक बने।
  • दक्षिणपंथी हिंदू महासभा के प्रारंभिक नेताओं में से एक मालवीय समाज सुधारक और सफल सांसद थे।

महामना मदन मोहन मालवीय राजनीति के मंच पर यूं छाए

  • मालवीय 1886 में कलकत्ता में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में प्रेरक भाषण देते ही राजनीति के मंच पर छा गए। उन्होंने लगभग 50 साल तक कांग्रेस की सेवा की।
  • कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष रहे जिसमें 1909 (लाहौर), 1918 (दिल्ली), 1930 (दिल्ली) और 1932(कलकत्ता) शामिल है।
  • उन्होंने अत्यंत प्रभावशाली अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द लीडर’ की 1909 में स्थापना की जो इलाहाबाद से प्रकाशित होता था।
  • 1930 में जब महात्मा गांधी नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया तो उन्होंने इसमें हिस्सा लिया और गिरफ्तारी दी।
  • मालवीय इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड में सक्रिय रुप से शामिल रहे और वह 1903-1918 के दौरान प्रॉविन्शियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य, 1910-1920 के दौरान सेंट्रल काउंसिल, 1916-1918 के दौरान इंडियन लेजिस्लेटिव असेंबली के निर्वाचित सदस्य रहे।
  • उन्होंने 1931 में दूसरे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया। उन्होंने 1937 में सक्रिय राजनीति को अलविदा कहकर और अपना पूरा ध्यान सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित कर दिया।
  • उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन और बाल विवाह का विरोध करने के साथ ही महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया। उनका 1946 में निधन हो गया।
  • 24 दिसंबर, 2014 को उनकी 153वीं जयंती से एक दिन पहले उनको भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।
  • देश को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसा संस्थान देने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय की आज जयंती है। 25 दिसंबर, 1861 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जन्मे महामना ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। उनका निधन 12 नवंबर, 1946 को हुआ था। आइए आज उनकी जयंती के मौके पर उनसे जुड़ीं कुछ खास बातें जानते हैं…


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सत्यमेव जयते — भारत के राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ (सच की जीत होती है) को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उनको ही जाता है। ‘सत्यमेव जयते’ हजारों साल पहली लिखे गए उपनिषदों का एक मंत्र है।

बीएचयू की स्थापना और निजाम — मालवीय ने बीएचयू जैसे संस्थान के सपने को हकीकत में बदलने के लिए बहुत कठिन मेहनत की। जब उन्होंने यूनिवर्सिटी खोलने के लिए निजाम से आर्थिक मदद मांगी थी तो निजाम ने मदद देने से इनकार कर दिया था। कहा जाता है कि पंडित मदन मोहन मालवीय (Pt Madan Mohan Malviya​) ने इसके बाद फंड जुटाने के मकसद से मार्केट में अपने स्लिपर की नीलामी की। संयोग की बात है कि चप्पल की बोली उसी निजाम ने लगाई और उसे बड़ी रकम देकर खरीदा।

​क्रांतिकारियों की वकालत — जब मालवीय इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत कर रहे थे तो उन्होंने गोरखपुर के चौरी चौरा घटना में आरोपी बनाए गए क्रांतिकारियों का केस लड़ा था। कहा जाता है कि उन्होंने 153 क्रांतिकारियों को मौत की सजा से बचाया था।

​कांग्रेस से संबंध — भले ही आज बीजेपी के लीडर उनसे ज्यादा करीब हैं और उनको अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। लेकिन वह वल्लभभाई पटेल की तरह ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज चेहरों में से एक थे। वह चार बार यानी 1909, 1918, 1932 और 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।

हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक — अकसर मालवीय को हिंदू राष्ट्रवादी दिखाने की कोशिश की जाती है लेकिन उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काफी काम किए। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द पर दो प्रसिद्ध भाषण दिए जिनमें से एक भाषण उन्होंने 1922 में लाहौर में दिया था और दूसरा 1931 में कानपुर में।

 



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