Raja Mahendra Pratap Biography : राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जीवनी

Top News
Raja Mahendra Pratap Biography : राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जीवनी
Raja Mahendra Pratap Biography : राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जीवनी

Raja Mahendra Pratap : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) के नाम पर यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करेंगे. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सितंबर, 2019 में अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम एक राज्य स्तरीय यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की थी.

Advertisement

इस यूनिवर्सिटी के शिलान्यास कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अलीगढ़ पहुँचने और इस यूनिवर्सिटी को खोले जाने को लेकर राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी जिन बातों को प्रचारित कर रही है उसमें कहा जा रहा है कि वह उन लोगों को सम्मान देने का काम कर रही है जिन्हें पिछली सरकारों में भुला दिया गया.

योगी ने दो साल पहले की थी घोषणा

Raja Mahendra Pratap : राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) के नाम पर यूनिवॢसटी की घोषणा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जाट बहुल क्षेत्र जिले की इगलास विधानसभा सीट के लिए 2019 में हुए उपचुनाव के दौरान की थी। मुख्यमंत्री ने कई बार अपने भाषणों में राजा द्वारा एएमयू को जमीन  दान करने का जिक्र भी किया था ।

हालांकि एएमयू में राजा (Raja Mahendra Pratap Singh) के नाम पर किसी इमारत या हाल का नाम नहीं है।राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवॢसटी बनना जाट समाज के लिए गर्व की बात है। अभी तक किसी सरकार ने राजा के लिए इस तरह सोचा नहीं था। ये पूरे जाट समाज का सम्मान है।


राजा महेन्द्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी के निर्माण

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2019 में अलीगढ़ में राजा महेन्द्र प्रताप नाम पर अलीगढ़ में राज्य विश्वविद्यालय स्थापित करने का वादा किया था। इसके बाद 14 सितंबर 2019 को विश्वविद्यालय के निर्माण की घोषणा की थी।

अब 14 सितंबर पीएम मोदी इसकी आधारशिला रखेंगे। महाराजा महेन्द्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) जाट नेता थे। उन्होंने ही विश्व विख्यात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवॢसटी के लिए जमीन दान दी थी।


राजा महेंद्र प्रताप विवि का शिलान्‍यास 

अभी तक राजा के नाम पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे उनकी शान में बढ़ोतरी हो। यह अब योगी सरकार करने जा रही है। 14 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोधा ब्लाक क्षेत्र के गांव मूसेपुर के पास राजा महेंद्र प्रताप राजकीय विश्वविद्यालय की नींव रखेंगे। इसे जाट समाज के नेता राजा महेंद्र प्रताप के लिए बड़ी श्रद्धांजलि मान रहे हैं।

लेकिन पिछली सरकारों ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) के योगदान को पूरी तरह भुला दिया गया. उनसे कम योगदान देने वालों का नाम पिछली सरकारों में हर दूसरे तीसरे दिन लिया जाता रहा,

लेकिन जाट समुदाय के इतने महान नेता के योगदान को याद नहीं रखा गया.” इस विश्वविद्यालय की स्थापना के पश्चिम उत्तर प्रदेश में बड़े मायने भी हैं। जाट आंदोलन इसी क्षेत्र में है और विधानसभा चुनाव भी अधिक दूर नहीं।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘माई लाइफ स्टोरीÓ में लिखा है कि उन्हेंं गुल्ली डंडा के साथ टेनिस व चेस का शौक था। कालेज की छुट्टियों में अपना समय मुरसान व वृंदावन में बिताते थे

यह भी पढ़ें : Hindi Diwas :हिंदी दिवस पर महापुरुषों के अनमोल विचार व वचन

राजा के नाम हो सकता है एएमयू का स्कूल

राजा महेंद्र प्रताप (Raja Mahendra Pratap Singh) ने अपना पूरा जीवन देश सेवा में लगाया। बहुत सारी सपंत्ति भी दान कर दी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवॢसटी (एएमयू) को भी राजा ने जमीन दी।

एएमयू का सिटी स्कूल राजा की 3.8 एकड़ जमीन पर बना हुआ है। यह जमीन 1929 में 90 साल के लिए लीज पर दी गई थी।

राजा के प्रपौत्र चरत प्रताप सिंह ने यूनिवॢसटी को प्रस्ताव दिया था कि जिस जमीन पर स्कूल बना है, उसे राजा का नाम दिया जाए। इस पर कुलपति ने एक कमेटी बनाई थी। कमेटी ने स्कूल का नाम राजा के नाम पर करने की रिपोर्ट दी थी। हालांकि अभी इस पर कोई निर्णय होना बाकी है।

यह भी पढ़ें : Radha Ashtami 2021: राधाष्टमी व्रत, जानिए पूजन विधि, महत्व एवं आरती

राजा महेन्द्र प्रताप (Raja Mahendra Pratap) का जन्म मुरसान नरेश राजा बहादुर घनश्याम सिंह के यहाँ 1 दिसम्बर सन 1886 ई. को हुआ था। राजा घनश्याम सिंह जी के तीन पुत्र थे, दत्तप्रसाद सिंह, बल्देव सिंह और खड़गसिंह, जिनमें सबसे बड़े दत्तप्रसाद सिंह राजा घनश्याम सिंह के उपरान्त मुरसान की गद्दी पर बैठे और बल्देव सिंह बल्देवगढ़ की जागीर के मालिक बन गए।

खड़गसिंह जो सबसे छोटे थे वही हमारे चरित नायक राजा महेन्द्र प्रताप (Raja Mahendra Pratap) जी हैं। मुरसान राज्य से हाथरस गोद आने पर उनका नाम खंड़गसिंह से महेन्द्र प्रताप सिंह हो गया था, मानो खड़ग उनके व्यक्तित्व में साकार प्रताप बनकर ही एकीभूत हो गई हो। कुँवर बल्देव सिंह का राजा साहब राजा महेन्द्र प्रताप (Raja Mahendra Pratap) से बहुत घनिष्ठ स्नेह था

और राजा साहब भी उन्हें सदा बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे। उम्र में सबसे छोटे होने के कारण राजा साहब अपने बड़े भाई को ‘बड़े दादाजी’ और कुँवर बल्देवसिंह जी को ‘छोटे दादाजी’ कहकर संबोधित किया करते थे। बचपन जब राजा साहब केवल तीन वर्ष के ही थे, तभी उन्हें हाथरस नरेश राजा हरिनारायण सिंह जी ने गोद ले लिया था,

किन्तु राजा साहब 7-8 वर्ष की अवस्था तक मुरसान में ही रहे। इसका कारण यह था कि राजा घनश्यामसिंह को यह डर था कि कहीं राजा हरिनारायण सिंह की विशाल सम्पत्ति पर लालच की दृष्टि रखने वाले लोभियों द्वारा बालक का कोई अनिष्ट न हो जाए। विद्यार्थी जीवन राजा साहब पहले कुछ दिन तक अलीगढ़ के गवर्नमेन्ट स्कूल में और फिर अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े।

यही कॉलेज बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। राजा साहब को अलीगढ़ में पढ़ने सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर भेजा गया था, क्योंकि राजा साहब के पिताजी राजा घनश्याम सिंह की सैयद साहब से व्यक्तिगत मित्रता थी।

इस संस्था की स्थापना के लिए राजा बहादुर ने यथेष्ट दान भी दिया था। उससे एक पक्का कमरा बनवाया गया, जिस पर आज भी राजा बहादुर घनश्याम सिंह का नाम लिखा हुआ है। राजा साहब स्वयं हिन्दू वातावरण में पले परन्तु एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े। इसका एक सुखद परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम धर्म और मुसलमान बन्धुओं का निकट सम्पर्क उन्हें मिला

और एक विशिष्ट वर्ग के (राजकुमारों की श्रेणी के) व्यक्ति होने के कारण तब उनसे मिलना और उनके सम्पर्क में आना सभी हिन्दू मुस्लिम विद्यार्थी एक गौरव की बात मानते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि राजा साहब का मुस्लिम वातावरण तथा मुसलमान धर्म की अच्छाइयों से सहज ही परिचय हो गया और धार्मिक संकीर्णता की भावना से वह सहज में ही ऊँचे उठ गए।

 जाट परिवार से निकले राजा महेंद्र प्रताप सिंह की शख़्सियत के कई रंग थे. वे अपने इलाक़े के काफ़ी पढ़े-लिखे शख़्स तो थे ही, लेखक और पत्रकार की भूमिका भी उन्होंने निभाई.

बाद में जब राजा साहब देश को छोड़ कर विदेशों में स्वतंत्रता का अलख जगाने गये, तब मुसलमान बादशाहों से तथा मुस्लिम देशों की जनता से उनका हार्दिक भाईचारा हर जगह स्वयं बन गया। राजा साहब के व्यक्तित्व की यह विशेषता उन्हें इस शिक्षा संस्थान की ही देन है। स्वतंत्रता सेनानी की भावना राजा साहब जब विद्यार्थी थे,

उनमें जहाँ सब धर्मों के प्रति सहज अनुराग जगा वहाँ शिक्षा द्वारा जैसे-जैसे बुद्धि के कपाट खुले वैसे-वैसे ही अंग्रेज़ों की साम्राज्य लिप्सा के प्रति उनके मन में क्षोभ और विद्रोह भी भड़का। वृन्दावन के राज महल में प्रचलित ठाकुर दयाराम की वीरता के किस्से बड़े बूढ़ों से सुनकर जहाँ उनकी छाती फूलती थी,

वहाँ जिस अन्याय और नीचता से गोरों ने उनका राज्य हड़प लिया था, उसे सुनकर उनका हृदय क्रोध और क्षोभ से भर जाता था और वह उनसे टक्कर लेने के मंसूबे बाँधा करते थे। जैसे-जैसे उनकी बुद्धि विकसित होती गई, वैसे अंग्रेज़ों के प्रति इनका विरोध भी मन ही मन तीव्र होता चला गया।

अंग्रेज़ पुलिस कप्तान से मुलाकात

राजा साहब जब अलीगढ़ में विद्यार्थी थे, उनके छोटे भाई दादा (बीच के भाई) कुँवर बल्देव सिंह प्राय: उनसे मिलने अलीगढ़ आते रहते थे। एक दिन वह उन्हें अपने साथ अलीगढ़ के अंग्रेज़ पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट से मिलाने ले गए। उस समय राजा साहब 19 या 20 वर्ष के नवयुवक थे। जब पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट से मुलाकात हुई,

तो कुँवर बल्देव सिंह ने उसे सलाम किया परन्तु राजा साहब ने ऐसा न करके उससे केवल हाथ मिलाया। बाद में जब बातचीत का सिलसिला चला तो राजा साहब ने पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट को किसी प्रसंग में यह भी हवाला दिया कि हमारे दादा अंग्रेज़ों से लड़े थे।

यह सुनकर सुपरिन्टेन्डेन्ट कुछ समय के लिए सन्न रह गया और कुछ मिनटों तक विचार-मग्न रहा। जब बाद में बातचीत का प्रसंग बदला तब वह सामान्य स्थिति में आ सका। इस प्रकार निर्भीकतापूर्वक अपनी स्पष्ट बात कह देने की आदत राजा साहब में बचपन से ही रही।

पहले विश्वयुद्ध के दौरान अफ़ग़ानिस्तान जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई. वे इस निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति थे.

एक दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार की घोषणा की थी.

निर्वासित सरकार का मतलब यह है कि अंग्रेज़ों के शासन के दौरान स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा. राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जो काम किया था, वही काम बाद में सुभाष चंद्र बोस ने किया था. इस लिहाज़ से देखें तो दोनों में समानता दिखती है.

हालांकि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेसी थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह घोषित तौर पर कांग्रेस में नहीं रहे. हालांकि उस दौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं तक उनकी धमक पहुँच चुकी थी. इसका अंदाज़ा महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ से होता है जिसमें उनके महात्मा गांधी से संपर्क का ज़िक्र है.

राजा महेंद्र प्रताप ने अपनी निर्वासित सरकार का प्रधानमंत्री मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली को बनाया था.


एक और दिलचस्प बात यह है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह कभी हिंदू-मुसलमान के पचड़े में नहीं पड़े. उन्हें आर्य पेशवा त्याग मूर्ति के तौर पर भी जाना जाता रहा. “सच्चाई तो यह है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह सर्वधर्म समभाव के लिए जाने जाते रहे थे.

वे कहते भी थे कि एक ही धर्म होना चाहिए प्रेम धर्म. और तो और वे लोगों को अपना नाम ‘पीर पीटर प्रेम प्रताप’ तक बताया करते थे. ऐसे में उन्हें हिंदू या केवल जाट तक केंद्रित करना उचित नहीं होगा.”

राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में जो निर्वासित सरकार बनायी थी, उसमें वे ख़ुद तो राष्ट्रपति बने थे जबकि प्रधानमंत्री उन्होंने मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली को बनाया था. ख़ास बात यह है कि स्वतंत्रता संग्राम से पहले ना तो कांग्रेस के नरम दल में ही वे रहे और ना ही गरम दल में और आज़ादी के बाद ना तो कांग्रेस के साथ रहे और ना ही जनसंघ के साथ. हालांकि उनका रूझान वामपंथ की ओर ज़रूर दिखा और वे रूसी क्रांति से प्रभावित थे.

 राजा महेंद्र प्रताप ने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की थी और उनका यक़ीन था कि शिक्षा के ज़रिए ही समाज में प्रेम और सद्भाव को स्थापित किया जा सकता है. यह प्रेम विद्यालय मौजूदा समय में वृंदावन पॉलीटेकनिक संस्थान के तौर पर उम्दा संस्थान माना जाता है. शांति-सद्भाव और शिक्षा के लिए कोशिशों को देखते हुए ही 1932 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को शांति के नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में राजा महेंद्र प्रताप सिंह पर उर्दू में लिखी किताब

इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के विचारों को भी जगह दी गई है. गांधी ने महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में कहा था, “राजा महेंद्र प्रताप के लिए 1915 में ही मेरे हृदय में आदर पैदा हो गया था. उससे पहले भी उनकी ख्याति का हाल अफ़्रीका में मेरे पास आ गया था. उनका पत्र व्यवहार मुझसे होता रहा है जिससे मैं उन्हें अच्छी तरह से जान सका हूं. उनका त्याग और देशभक्ति सराहनीय है.”

बहरहाल, सुभाष चंद्र बोस निर्वासित सरकार के गठन के बाद स्वदेश नहीं लौट सके, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह भारत भी लौटे और आज़ादी के बाद राजनीति में भी सक्रिय हुए. 32 साल तक देश से बाहर रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारत को आज़ाद कराने की कोशिशों के लिए जर्मनी, रूस और जापान जैसे देशों से मदद माँगी. हालांकि वे उसमें कामयाब नहीं हुए.

1946 में जब वो भारत लौटे तो सबसे पहले वर्धा में महात्मा गांधी से मिलने गए. लेकिन भारतीय राजनीति में उस दौर की कांग्रेस सरकारों के ज़माने में उन्हें कोई अहम ज़िम्मेदारी निभाने का मौक़ा नहीं मिला.

भारतीय राजनीति में उस दौर में उन्हें कोई अहम ज़िम्मेदारी निभाने का मौका नहीं मिला

जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति में जर्मनी और जापान मित्र देश नहीं रहे थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इन देशों से मदद माँगकर आज़ादी की लड़ाई शुरू की थी. ऐसे में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को कांग्रेस में बहुत ज़्यादा तरजीह नहीं मिली.

बहरहाल, 1957 में वे मथुरा से चुनाव लड़े और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने जीत हासिल की. इस चुनाव की सबसे ख़ास बात यह थी कि जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी भी यहां चुनाव मैदान में खड़े हुए थे.

उस चुनाव में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने कांग्रेस के चौधरी दिगंबर सिंह को क़रीब 30 हज़ार वोटों से हराया था.

“राजा महेंद्र प्रताप सिंह कैसी शख़्सियत थे, इसका अंदाज़ा आप लगाइए. चुनाव प्रचार के दौरान एक दिन वे अपनी कार से चौधरी दिगंबर सिंह घर पहुँचे और कहा कि मुझे यमुना खादर के जिस इलाक़े में प्रचार करने जाना है वहां रेत ही रेत है और कार से जाना मुश्किल है,

तो तुम्हारी जीप मैं ले जा रहा हूं और तुम मेरी कार ले जाना. हालांकि ये बात दूसरी है कि जब चौधरी दिगंबर सिंह चुनाव प्रचार के लिए निकलने को तैयार हुए तो राजा साब के ड्राइवर ने कहा कि कहीं जाने की अनुमति तो राजा साहब ने दी ही नहीं है.”

यह दर्शाता है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह अपने राजनीतिक विरोधियों से भी राब्ता रखते थे.1957 में “पाँच लोग थे चुनावी मैदान में, चौधरी दिगंबर सिंह दूसरे स्थान पर रहे थे और अटल बिहारी वाजपेयी चौथे स्थान पर, उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. लेकिन वे बलरामपुर से भी चुनाव लड़ रहे थे और वहां चुनाव जीतकर वे पहली बार लोकसभा पहुँचे थे.”

वैसे चौधरी दिगंबर सिंह उस दौर में जाट समुदाय के बड़े कांग्रेसी नेता थे और उन्होंने अपनी इस हार का बदला 1962 में राजा महेंद्र सिंह को क़रीब 30 हज़ार वोट से ही हराकर ले लिया था. लेकिन चौधरी दिगंबर सिंह और राजा महेंद्र प्रताप सिंह के रिश्ते हमेशा मधुरता भरे रहे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह पर अभिनंदन ग्रंथ उन्होंने ही प्रकाशित कराया था.

वैसे यह सच है कि 1962 में मथुरा लोकसभा से चुनाव हारने के बाद वे सार्वजनिक जीवन में बहुत सक्रिय नहीं रहे और उनका निधन 29 अप्रैल, 1979 को हुआ था. उनके निधन पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था.

आज की पीढ़ी राजा महेंद्र प्रताप सिंह से अनजान

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस यूनिवर्सिटी की शुरुआत करके राजा महेंद्र प्रताप सिंह का परिचय आज की पीढ़ी से करा दिया है. 

समाचार सौजन्य :भारतकोश 

Leave a Reply