Raksha Bandhan 2020: Shubh Muhurat,Mahasanyog

आस्था

प्रतेक वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को Raksha Bandhan का पर्व मनाया जाता है। रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) का यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को गहरा करने वाला पर्व है। एक ओर जहां भाई-बहन के प्रति अपने दायित्व निभाने का वचन बहन को देता है,

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तो दूसरी ओर बहन भी भाई की लंबी उम्र के लिये प्रार्थना करती है तथा उपवास रखती है। इस दिन भाई की कलाई पर जो राखी बहन बांधती है वह सिर्फ रेशम की डोर या धागा मात्र नहीं होती बल्कि वह बहन-भाई के अटूट और पवित्र प्रेम का बंधन होता है।

इस वर्ष Raksha Bandhan का त्योहार 3 August को है. इस 2020 के Raksha Bandhan की सबसे खास बात ये है कि इस दिन सावन का आखिरी सोमवार (Monday) भी है. इसके साथ ही 3 August को Sawan Purnima भी है,

रक्षाबंधन शुभ महूर्त- (Raksha Bandhan Shubh Muhurat)
राखी बांधने का मुहूर्त: 09:30:30 से 21:11:21 तक
रक्षा बंधन अपराह्न मुहूर्त : 13:45:16 से 16:23:16 तक
रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त : 19:01:15 से 21:11:21 तक

रक्षा बंधन महासंयोग (Raksha Bandhan Mahasanyog)

भाई-बहन के प्रेम उत्सव का प्रतीक Raksha Bandhan  इस बार बेहद खास होगा क्योंकि इस वर्ष Raksha Bandhan के दिन सर्वार्थ सिद्धि और आयुष्मान दीर्घायु का Mahasanyog भी बन रहा है जिसकी वजह से इस बार का रक्षाबंधन बहुत शुभ रहने वाला है, ऐसा शुभ संयोग 29 वर्षो के बाद आया है। साथ ही इस वर्ष भद्रा और ग्रहण का साया भी रक्षाबंधन पर नहीं पड़ रहा है।

क्युकी इस वर्ष Raksha Bandhan से पहले 2 August की रात्रि 8 बजकर 43 मिनट से 3 August को सुबह 9 बजकर 28 मिनट तक भद्रा रहेगए । लेकिन इसके साथ ही शाम 7 बजकर 49 मिनट से दीर्घायु कारक आयुष्मान योग भी लग जाएगा।

प्रतेक बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिये रक्षा बंधन के दिन का इंतजार करती है। यदि इसकी शुरुआत के बारे में देखा जाये तो यह भाई-बहन का त्यौहार नहीं बल्कि विजय प्राप्ति के किया गया रक्षा बंधन है। इस पर्व को मनाने के पिछे अनेको कहानियां बताई जाती हैं।जिनमे से कुछ कहानिया ब्लॉग के माध्यम से आप सभी पाठको तक पहुंचने की कोशिस कि है

रक्षा बंधन की कुछ पौराणिक कथाये

भविष्‍य पुराण की कथा

बहुत समय पहले की बाद है देवताओं और असुरों में युद्ध छिड़ा हुआ था लगातार 12 साल तक युद्ध चलता रहा और अंतत: असुरों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर देवराज इंद्र के सिंहासन सहित तीनों लोकों को जीत लिया।

इसके बाद इंद्र देवताओं के गुरु, बृहस्पति के पास के गये और सलाह मांगी। बृहस्पति ने इन्हें मंत्रोच्चारण के साथ रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन गुरू बृहस्पति ने रक्षा विधान संस्कार आरंभ किया।

इस रक्षा विधान के दौरान मंत्रोच्चारण से रक्षा पोटली को मजबूत किया गया। पूजा के बाद इस पोटली को देवराज इंद्र की पत्नी शचि जिन्हें इंद्राणी भी कहा जाता है ने इस रक्षा पोटली के देवराज इंद्र के दाहिने हाथ पर बांधा। इसकी ताकत से ही देवराज इंद्र असुरों को हराने और अपना खोया राज्य वापस पाने में कामयाब हुए।

द्रौपदी और श्रीकृष्‍ण की कथा

 Raksha Bandhan 2020: Shubh Muhurat,Mahasanyog

 रक्षाबंधन पर्व पर एक कथा और प्रचलित है की शिशुपाल राजा का वध करते समय भगवान श्री कृष्ण के बाएं हाथ से खून बहने लगा, तो द्रोपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनके हाथ की अंगुली पर बांध दिया।

कहा जाता है कि तभी से भगवान कृष्ण द्रोपदी को अपनी बहन मानने लगे और सालों के बाद जब पांडवों ने द्रोपदी को जुए में हरा दिया और भरी सभा में जब दुशासन द्रोपदी का चीरहरण करने लगा तो भगवान कृष्ण ने भाई का फर्ज निभाते हुए उसकी लाज बचाई थी। और तभी से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाने लगा, जो आज भी जारी है।

शास्त्रों के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। जिस तरह से शनि का स्वभाव क्रूर और क्रोधी है उसी प्रकार से भद्रा का भी है।

भद्रा के उग्र स्वभाव के कारण ब्रह्माजी ने इन्हें पंचाग के एक प्रमुख अंग करण में स्थान दिया। पंचाग में इनका नाम विष्टी करण रखा गया है। दिन विशेष पर भद्रा करण लगने से शुभ कार्यों को करना निषेध माना गया है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार रावण की बहन ने भद्राकाल में ही अपने भाई की कलाई में रक्षासूत्र बांधा था जिसके कारण ही रावण का सर्वनाश हुआ था। 

सिकंदर और पुरू की कथा

 सिकंदर की पत्नी ने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास यानी कि राजा पोरस को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया. पुरूवास ने युद्ध के दौरान सिकंदर को जीवनदान दिया.

सिकंदर और पोरस ने युद्ध से पहले रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी. युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार के लिए हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रुक गए और वह बंदी बना लिया गया. सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया.

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