Sumitranandan Pant Birth Anniversary | sumitra nandan pant anniversary | सुमित्रानंदन पंत जयंती प्रकृति के सुकुमार कवि Sumitranandan Pant की स्मृतियां | 

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sumitranandan pant ji ka jivan parichay
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Sumitranandan Pant Birth Anniversary |  सुमित्रानंदन पंत जयंती प्रकृति के सुकुमार कवि Sumitranandan Pant की स्मृतियां

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Pant Birth Anniversary : ‘छायावादी युग’ के 4 प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत हिंदी काव्य की नई धारा के प्रवर्तक भी कहे जाते है. इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, पंत और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग बोला जा रहा है. सुमित्रानंदन पंत परंपरावादी आलोचकों के सामने कभी झुके नहीं. वह ऐसे साहित्यकारों में भी शुमार किए जाते है, जिनके काव्य में प्रकृति-चित्रण समकालीन कवियों में सबसे अच्छा था. प्रख्यात कवि सुमित्रानंदन पंत की कविताएं अब भी साहित्य प्रेमियों को आकर्षित करती हैं। लेखन के जरिए उन्होंने सबको अपना कायल बनाया था।

उत्तराखंड के कौसानी में जन्मे और प्रयागराज में ली अंतिम सांस

सुमित्रानंदन पंत का बचपन : भारत का स्विट्जरलैंड कहा जाने वाला कौसानी जहां पर्यटकों को अपने नैसर्गिक सौन्दर्य से आकर्षित करता है,यही प्रख्यात कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई, 1900 में हुआ .भारत का स्विट्जरलैंड कहा जाने वाला कौसानी जहां पर्यटकों को अपने नैसर्गिक सौन्दर्य से आकर्षित करता है,

सुमित्रानंदन पंत का जीवन अभाव में बीता। इनके जन्म के 6 घंटे के उपरांत ही इनकी माता का देहांत हो गया था. पिता गंगादत्त व मां सरस्वती की वे आठवीं संतान थे। बचपन में उन्हें सब ‘गुसाईं दत्त’ के नाम से पहचाने जाने लगे थे. माता के देहांत के उपरांत वह अपनी दादी के पास रहते थे.

7 वर्ष की आयु में कविता लिखना शुरू कर दी

स्लेटी छतों वाले पहाड़ी घर, आंगन के सामने आडू, खुबानी के पेड़, पक्षियों का कलरव, सर्पिल पगडण्डियां, बांज, बुरांश व चीड़ के पेड़ों की बयार व नीचे दूर दूर तक मखमली कालीन सी पसरी कत्यूर घाटी व उसके उपर हिमालय के उत्तंग शिखरों और दादी से सुनी कहानियों व शाम के समय सुनायी देने वाली आरती की स्वर लहरियों ने गुसाईं दत्त को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था। 7 वर्ष की आयु में जब वह चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दी

पिता ‘गंगादत्त’ उस समय कौसानी चाय बग़ीचे के मैनेजर थे। उनके भाई संस्कृत व अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार थे, जो हिन्दी व कुमाँऊनी में कविताएं भी लिखा करते थे। यदाकदा जब उनके भाई अपनी पत्नी को मधुर कंठ से कविताएं सुनाया करते तो बालक गुसाईं दत्त किवाड़ की ओट में चुपचाप सुनता रहता और उसी तरह के शब्दों की तुकबन्दी कर कविता लिखने का प्रयास करता। बालक गुसाईं दत्त की प्राइमरी तक की शिक्षा कौसानी के ‘वर्नाक्यूलर स्कूल’ में हुई।

इनके कविता पाठ से मुग्ध होकर स्कूल इंसपैक्टर ने इन्हें उपहार में एक पुस्तक दी थी। ग्यारह साल की उम्र में इन्हें पढा़ई के लिये अल्मोडा़ के ‘गवर्नमेंट हाईस्कूल’ में भेज दिया गया। कौसानी के सौन्दर्य व एकान्तता के अभाव की पूर्ति अब नगरीय सुख वैभव से होने लगी।

sumitra nandan pant anniversary
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अल्मोडा़ की ख़ास संस्कृति व वहां के समाज ने गुसाईं दत्त को अन्दर तक प्रभावित कर दिया। सबसे पहले उनका ध्यान अपने नाम पर गया। और उन्होंने लक्ष्मण के चरित्र को आदर्श मानकर अपना नाम गुसाईं दत्त से बदल कर ‘सुमित्रानंदन’ कर लिया। कुछ समय बाद नेपोलियन के युवावस्था के चित्र से प्रभावित होकर अपने लम्बे व घुंघराले बाल रख लिये सन् 1917 में पंत अपने मंझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे. यहां से उन्होंने माध्यमिक शिक्षा भी हासिल कर ली थी.

गुसाईं कैसे बनें सुमित्रानंदन पंत

उन्हें अपना नाम गुसाईं दत्त पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत कर लिया था. काशी के क्वींस कॉलेज में कुछ दिन शिक्षा लेकर वह इलाहाबाद चले गए और वहां के म्योर कॉलेज में पढ़ने लगे. वह इलाहाबाद में कचहरी के पास एक सरकारी बंगले में अपना जीवन यापन करते थे. उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी काम किया. उन्होंने 1926 में ‘पल्लव नामक पुस्तक लिखकर छायावाद को स्थापित कर दिया।

कविता लिखने का आग्रह किया अस्वीकार

ज्ञानपीठ व पद्मविभूषण जैसे सम्मान से सम्मानित सुमित्रानंदन पंत कभी खुद की तारीफ पर अभिभूत नहीं हुए। साहित्यिक चिंतक डा. मोरारजी त्रिपाठी के अनुसार 1928 में कुछ लोगों ने उनसे गंगा पर कविता लिखने का आग्रह किया। पंत जी ने उनका आग्रह अस्वीकार कर दिया। बोले, ‘मैं बिना मौके पर जाकर अनुभूति किए बिन नहीं लिख सकता। प्रतापगढ़ के कालाकांकर में कई साल तक गंगा तीरे ‘नक्षत्र नामक कुटिया में रहे। वहीं, गंगा पर आधारित ‘नौका विहार तथा दूसरी कविता ‘परिर्वतन लिखी।

हिंदी साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाने वाले इस कवि ने महानायक अमिताभ बच्चन को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था।

हरिवंश राय ‘बच्चन’ और श्री अरविंदो के साथ उनकी ज़िंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकाल में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है।

28 दिसंबर 1977 को सुमित्रानंदन पंत ने  प्रयागराज में उन्होंने अंतिम सांस ली।

साभार bhartdiscovery.org

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