Uttarakhand ghee sankranti festival : घी संक्रांति कब है

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Uttarakhand Ghee Tyohar

Uttarakhand ghee sankranti festival : उत्तराखंड जहां एक ओर अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। वही प्रमुख तीर्थ स्थलों के कारण इसे देव भूमि के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ लोग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है

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प्रकृति और किसानो का उत्तराखंड के लोक जीवन में अत्यधिक महत्व रहा है. सौर मासीय पंचांग के अनुसार सूर्य एक राशि में संचरण करते हुए जब दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं, इसको भी शुभ दिन मानकर कई त्योहार मनाये जाते हैं । और इन्ही त्यौहार में से एक है “घी त्यार”.

हरेला जिस तरह बीज को बोने और वर्षा ऋतु के आने के प्रतीक का त्यौहार है। वहीं “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालियां लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है.

घी संक्रांति उत्तराखंड का प्रमुख लोकपर्व है। घी संक्रांति, घी त्यार ,ओलगिया या घ्यू त्यार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह की सिंह संक्रांति के दिन मनाया जाता है।

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2021 में घी संक्रांति 17 अगस्त 2021 को मंगलवार के दिन मनाई जाएगी। इस दिन से सूर्य भगवान सिंह राशी में विचरण करेंगे। ( ghee sankranti 2021 )

घी त्यौहार क्यों मनाया जाता है ?

भाद्रपद (भादो) महीने की संक्रांति जिसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन सूर्य “सिंह राशि” में प्रवेश करते है और इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते है।  

Uttarakhand ghee sankranti festival : भगवान सूर्यदेव जिस तिथि को अपनी राशी परिवर्तन करते है। उस तिथि को संक्रांति कहा जाता है। और उत्सव मनाए जाते हैं। उत्तराखंड में मासिक गणना के लिए सौर पंचांग का प्रयोग होता है। प्रत्येक संक्रांति उत्तराखंड में माह का पहला दिन होता है, और उत्तराखंड में पौराणिक रूप से और पारम्परिक रूप से प्रत्येक संक्रांति को लोक पर्व मनाया जाता है। इसीलिए उत्तराखंड में कहीं कही स्थानीय भाषा मे त्यौहार को सग्यान (संक्रांति ) कहते हैं।

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यह त्यौहार भी हरेले की ही तरह ऋतु आधारित त्यौहार है। हरेला जिस तरह बीज को बोने और वर्षा ऋतु के आने के प्रतीक का त्यौहार है। वहीं “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालियां लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है।

यह खेती बाड़ी और पशु के पालन से जुड़ा हुआ लोकपर्व है और इस दिन किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं। फसलो में लगी बालियों को किसान अपने घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों और गोबर से चिपकाते है।

इस त्यौहार के समय पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलहाना शुरु कर देती हैं। साथ ही स्थानीय फलों, यथा अखरोट आदि के फल भी तैयार होने शुरु हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि अखरोट का फल घी-त्यार के बाद ही खाया जाता है ।  

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अरबी के पत्तों की सब्जी
अरबी के पत्तों की सब्जी

घी त्यौहार का महत्व

Uttarakhand ghee sankranti festival : उत्तराखंड के सभी लोक पर्वो की तरह घी संक्रांति भी प्रकृति एवं स्वास्थ को समर्पित त्यौहार है। पूजा पाठ करके इस दिन अच्छी फसलों की कामना करते हैं। अच्छे स्वास्थ के लिए,घी एवं पारम्परिक पकवान खाये जाते हैं।

पहाड़ों में यह बात मानी जाती है कि घी संक्रांति के दिन घी खाना जरूरी होता है। जो व्यक्ति घी का सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में गनेल (घोंघा) (Snail) बनता है । इसलिए इसी वजह से घी त्यार के दिन घी खाने के साथ घी का सेवन जरूर किया जाता है, और घी से बने पकवान बनाये जाते हैं। इस दिन सबके सिर में घी रखते हैं।

बुजुर्ग लोग जी राये जागी राये के आशीर्वाद के साथ नवजात बच्चों और छोटे बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी रखते हैं। उसकी जीभ में भी थोड़ा सा घी रखा जाता है । इस दिन परिवार के हर सदस्य जरूर घी का सेवन करता है।

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उत्तराखंड के लोग अपनी सरलता और प्रेम भाव लिए भी जाने जाते है वहां की निवासी होने से मैंने इसको करीब से देखा और महसूस किया है बिना दूध दही के हमारे यहाँ त्यौहार अधूरे है।

बरसात में मौसम में पशुओं को खूब हरी घास मिलती है जिससे की दूध में बढ़ोतरी होने से दही -मक्खन -घी की भी प्रचुर मात्रा मिलती है अगर किसी के घर में दुधारू पशु नहीं होते गांव वाले उनके यहां दूध और घी पहुंचाते हैं और सभी प्रेम भाव से हर त्यौहार मनाते है।

घी त्यौहार बनाये जाने वाले प्रमुख व्यंजन

Uttarakhand Ghee Tyohar
अरबी के पत्तों की सब्जी

Uttarakhand ghee sankranti festival : घी संक्रांति से दिन प्रमुख बनाये जाने वाले व्यंजन घी में तैयार किये जाते है जैसे हलवा-पूरी, बड़े,  मालपुवे, खीर, और  अरबी के पत्तों की सब्जी (Scientific name: Colocasia esculenta) के पत्तो की सब्जी जिसको विशेष रूप से बनाया जाता है।

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अरबी के पत्तों का मुख्यतः प्रयोग किया जाता है। सर्वोत्तम अरबी के पत्ते और मौसमी फल सब्जियां और फल अपने कुल देवताओं को चढ़ाई जाती है। उसके बाद गाँव के प्रतिष्ठित लोगो के पास ( पधान जी ) उपहार लेकर जाते हैं। फिर रिश्तेदारों को दिया जाता है।

इस दिन उत्तराखंड का एक विशेष पकवान बनाया जाता है, जिसे बेड़ू रोटी कहा जाता है। बेड़ू रोटी को आटे में उड़द की दाल पीस कर डाली जाती है। इस समय पहाड़ी खीरा काफी मात्रा में होते हैं, इसलिए इस त्यौहार पर पहाड़ी खीरे का रायता भी जरूर बनाया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं एवं आयुर्वेद के अनुसार घी संक्रांति के दिन घी का सेवन करने से निम्न लाभ होते है 

  • घी संक्रांति के दिन घी का सेवन करने से ग्रहों के अशुभ प्रभावों से रक्षा होती है। कहा जाता है, जो इस दिन घ्यू (घी ) का सेवन करते हैं,उनके जीवन मे राहु केतु का अशुभ प्रभाव नही पड़ता है।
  • घी को शरीर मे लगाने से, बरसाती बीमारियों से त्वचा की रक्षा होती है। सिर में घी रखने से सिर की खुश्की नही होती।
  • मनुष्य को चिंताओ और मुक्ति मिलती है। अर्थात सुकून मिलता है। बुद्धि तीव्र होती है। इसके अलावा शरीर की कई व्याधियां दूर होती हैं। कफ ,पित्त दोष दूर होते है। शरीर बलिष्ठ होता है।
  • घी त्यार के दिन एक दूसरे को दूध, दही और फल सब्जियों के उपहार (भेंट ) बांटे जाते हैं 
  • घी संक्रांति या घी त्यार के दिन दूध दही, फल सब्जियों के उपहार एक दूसरे को बाटे जाते हैं। इस परम्परा को उत्तराखंड में ओग देने की परम्परा या ओलग परम्परा कहा जाता है। इसीलिए इस त्यौहार को ओलगिया त्यौहार, ओगी त्यार भी कहा जाता है।

यह परम्परा चंद राजाओं के समय से चली आ रही है, उस समय भूमिहीनों को और शासन और समाज मे वरिष्ठ लोगों को उपहार दिए जाते थे। इन उपहारों में काठ के बर्तन ( स्थानीय भाषा मे ठेकी कहते हैं ) में दही या दूध और अरबी के पत्ते और मौसमी सब्जी और फल दिये जाते थे। यही परम्परा आज भी चली आ रही है।

आप सभी को Saneetaspen.com की ओर से Ghee Tyohar की हार्दिक शुकमनाये

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