Why Mao ordered all sparrows killed

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World Sparrow Day Why Mao ordered all sparrows killed

Why Mao ordered all sparrows killed | What was Mao Zedong’s Four Pests Campaign and how did it impact China | ग्रेट चाइनीज फेमिने चीन में शुरू हुआ था गौरैया मारने का अभियान
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इतिहास में कई शासकों ने अजीब अजीब से नियम बनाए और उनको देश की जनता पर थोप दिया बिना उसका परिणाम जाने। लेकिन एक ऐसी भी घटना हुई जिसमे चीन के राजा ने एक बहुत ही अजीब घोषणा की और जनता ने भी भरपूर साथ दिया लेकिन बाद मे इसके कारण करोड़ों लोग मर गए। इतनी ज्यादा मौतों के पीछे सिर्फ एक छोटी सी गलती थी जिसे हम “ग्रेट चाइनीज फैमिन” के नाम से जानते है। तो आइए जानते हैं की ग्रेट चाइनीज फैमिने क्या थी और इसके क्या परिणाम हुए।

ग्रेट चाइनीज फेमिने चीन में शुरू हुआ था गौरैया मारने का अभियान

सन् 1958 में चीन के राजा थे ” माओ जेडांग” और बात 1958 की ही है, जब माओ जेडोंग ने एक अभियान शुरू किया था, जिसे Four Pests Campaign का नाम दिया था. इस अभियान के तहत चार पेस्ट को मारने का फैसला किया गया था. पहला था मच्छर, दूसरा मक्खी, तीसरा चूहा और चौथी थी हमारी प्यारी मासूम गौरैया. सोच कर भी अजीब लगता है

कि आखिर उस मासूम गौरैया से इंसानों को ऐसा क्या डर था, जिसके चलते उसे मारने का अभियान चलाने की नौबत आ गई. मानते हैं कि मच्छरों ने मलेरिया फैलाया, मक्खियों ने हैजा और चूहों ने प्लेग, तो इन सबका सफाया तो इंसानों के हित में था, लेकिन गौरैया का क्या दोष था?


गौरैया के माथे मढ़ा गया ये दोष Why Mao ordered all sparrows killed?

मासूम कही जाने वाली गौरैया को माओ जेडोंग ने ये कहकर मारने का फरमान सुना दिया था कि वह लोगों के अनाज खा जाती है. कहा गया कि गौरैया किसानों की मेहनत बेकार कर देती है और सारा अनाज खा जाती है. मच्छर, मक्खी और चूहे तो नुकसान करने के आदि हैं,

इसलिए वह खुद को छुपाने में भी माहिर निकले, लेकिन गौरैया जैसी मासूम चिड़िया तो इंसानों के सबसे नजदीक रहती थी, वह चाहकर भी खुद को छुपा न सकी. नजीता ये हुआ कि इंसानों ने भी बड़ी निर्ममता से उसे ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारा.

उड़ते-उड़ते थक जाती और जमीन पर आ गिरती गौरैया

चीन में उस समय के तथाकथिक क्रांतिकारियों ने जनता के बीच में इस अभियान को एक आंदोलन की तरह फैला दिया. लोग भी बर्तन, टिन, ड्रम बजा-बजाकर चिड़ियों को उड़ाते. लोगों की कोशिश यही रहती कि गौरैया किसी भी हालत में बैठने न पाए और उड़ती रहे.

बस फिर क्या था, अपने नन्हें परों को आखिर वो गौरैया कब तक चलाती. ऐसे में उड़ते-उड़ते वह इतनी थक जाती कि आसमान से सीधे जमीन पर गिर कर मर जाती. कोई गौरैया बच न जाए, ये पक्का करने के लिए उनके घोंसले ढूंढ़-ढूंढ़ कर उजाड़ दिए गए, जिनमें अंडे थे उन्हें फोड़ दिया गया और अगर किसी घोंसले में चिड़िया के बच्चे मिले तो उन्हें भी इंसानों की क्रूरता का शिकार होना पड़ा.

इनाम से नवाजा जाता था ‘हत्यारों’ को

जो शख्स जितनी अधिक गौरैया का कत्ल करता, उसे उतना ही बड़ा इनाम भी मिलता. स्कूल-कॉलेज में होने वाले आयोजनों में गौरैया का कत्ल करने वालों को मेडल मिलते. जो जितनी अधिक गौरैया मारता, उसे उतनी ही अधिक तालियों से नवाजा जाता. जाहिर सी बात है, लोगों में इस अभियान को इस तरह से फैलाया गया था कि लोगों को गौरैया का कत्ल करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी.

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जब दूतावास में भी नहीं बच पाई जान

गौरैया को जल्द ही ये समझ आ गया था कि उनके छुपने के लिए कौन सी जगह सबसे सुरक्षित है. बहुत सारी गौरैया झुंड बनाकर पीकिंग स्थित पोलैंड के दूतावास में जा छुपीं. गौरैया को मारने के लिए दूतावास में घुसने जा रहे लोगों को वहां के अधिकारियों ने बाहर ही रोक दिया.

लेकिन इंसान तो इंसान है, खासकर चीन के वो लोग जिनके सिर पर खून सवार हो. पूरे पोलिश दूतावास को चारों तरफ से घेर लिया गया. दो दिन तक लगातर ड्रम पीटे गए. आखिरकार ड्रमों के शोर से गौरैया के झुंड ने दम तोड़ दिया. सफाई कर्मियों के बेलचों से मर चुकी प्यारी गौरैया को दूतावास से बाहर फेंका गया.

गौरैया मारने का अंजाम भुगतना पड़ा भयंकर अकाल से

चीन में एक अभियान के तहत गौरैया का मारने का पाप तो लोगों ने कर दिया था. लेकिन महज दो सालों में ही अप्रैल 1960 आते-आते लोगों को इसका बेहद खौफनाक अंजाम भुगतना पड़ा. दरअसल, गौरैया सिर्फ अनाज नहीं खाती थी, बल्कि उन कीड़ों को भी खा जाती थी, जो अनाज की पैदावार को खराब करने का काम करते थे.

सन् 1960 में मशहूर पक्षी विज्ञानी ” शो शिन चेंग ” ने चीन के राजा को बताया की पक्षियों के मारने का आदेश वापस ले लें क्युकी पक्षियों और गौरियों के ना होने से फसल को नष्ट करने वाले कीड़ों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो गई है चूंकि गौरैया और पक्षी इन कीड़ों को खा जाते थे और फसलों को बचा लेते थे

What was Mao Zedong’s Four Pests Campaign and how did it impact China |

गौरैया के मर जाने का नजीता ये हुआ कि धान की पैदावार बढ़ने के बजाए घटने लगी. माओ को समझ आ चुका था कि उनसे भयानक भूल हो गई है. उन्होंने तुरंत ही गौरैया को Four pests से हटने के आदेश जारी कर दिए. और गौरैया की जगह अब खटमल मारने पर जोर देने को कहा. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. टिड्डी और दूसरे कीड़ों की आबादी तेजी से बढ़ी. गौरैया तो पहले ही मारी जा चुकी थीं,

जो उनकी आबादी पर लगाम लगाती. कीड़ों को मारने के लिए तरह-तरह की दवाओं का इस्तेमाल किया जाने लगा, लेकिन पैदावार बढ़ने के बजाय घटती ही रही. और आगे चलकर इसने एक अकाल का रूप ले लिया, जिसमें करीब 2.5 करोड़ लोग भूखे मारे गए.

माओ जेडोंग को अपनी भूल समझने में बहुत देर हो गई थी, लेकिन हमें तो यह पता है कि गौरैया हमारी पारिस्थितिकी के लिए कितनी अहम है. गौरैया के ना होने से कितना नुकसान हो सकता है, चीन का अकाल इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है.

गौरैया को मारें नहीं, ना ही भगाएं. ये चिड़िया इंसानों के सबसे करीब रहती है और जरा सोच कर देखिए, आखिर एक गौरैया आपका कितना अनाज खा जाएगी. आज के समय में शहरों में गौरैया मुश्किल से ही देखने को मिलती है. तो अपनी छत पर गौरैया के लिए पानी और मुट्ठी भर अनाज रखें, ताकि हमें कभी चीन जैसा अकाल देखने की नौबत न आए.

अकाल से बदला चीन के खानपान का तरीक़ा

अकाल में लोग मरने लगे तो चीन की वामपंथी सरकार ने गाँव-गांव में मुनादी करानी शुरू कर दी कि लोग मांसाहार करें। लेकिन हालत ये थी कि जानवर पहले ही मर चुके थे। कुल मिलाकर चूहे, चमगादड़, कीड़े-मकोड़े, कॉक्रोच ही बचे थे। नतीजा हुआ कि लोगों ने इन्हें ही खाना शुरू कर दिया।

कहते हैं कि कई लोग भूख से मरने वालों का मांस भी खा जाया करते थे, ताकि ज़िंदा रह सकें। कहते हैं कि हज़ारों लोगों को ज़िंदा मारकर खाने की घटनाएँ भी हुईं। चीनी पत्रकार याग जिशेंग (Yang Jisheng) ने इस दुर्घटना (मानवीय त्रासदी) पर एक किताब ‘टूमस्टोन’ (Tombstone) नाम से लिखी थी,

जो चीन में ही बैन कर दी गई. उनकी किताब पर चीन में इस कदर पाबंदी है कि अगर किसी के पास इसका डिजिटल एडिशन भी मिल जाए तो उसे जेल में डाल दिया जाता है।इस किताब में पत्रकार ने जिक्र किया है कि कैसे भूख से मरते लोग अपनों की लाशों को ही खाने लगे थे.

इस दौरान 2.5 करोड़ से भी ज्यादा चीनी आबादी मारी गई. वैसे चीन के सरकारी आंकड़ों में भुखमरी से मौत के आंकड़े 1.5 करोड़ बताए जाते हैं.

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