Wild mustard : स्वाद और खुशबू का खजाना एक चुटकी जखिया

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Wild mustard : स्वाद और खुशबू का खजाना एक चुटकी जखिया
Wild mustard : स्वाद और खुशबू का खजाना एक चुटकी जखिया

Wild mustard : स्वाद और खुश्बू का खजाना एक चुटकी जखिया,इसमें छिपे है अच्छी सेहत के राज

Wild mustard : जखिया (Wild mustard) उत्तराखंड

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के पहाड़ी इलाकों में तड़के के रूप में बहुत इस्तेमाल किया जाने वाला मसाला है। काली-भूरी रंगत वाले जखिया या जख्या के दाने सरसों और राई के हमशक्ल होते हैं। जितना मैदानी इलाकों में जीरे का महत्व है उतना ही पहाड़ी रसोईयो में जाखिये का महत्व है।

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जखिया (Wild mustard) हिमालयी क्षेत्र में औषधीय वनस्पतियों का खजाना है जखिया नामक विशिष्ट वनस्पतियों का उपयोग लोग सदियों से पारंपरिक व्यंजनों में करते आ रहे हैं। जखिया कैपरेशे (Cappridceac) परिवार की 200 से अधिक किस्मों में से एक है।

पहाड़ में जख्या, जखिया के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा अंग्रेजी में एशियन स्पाइडर फ्लावर, वाइल्ड डॉग या डॉग मस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है. इसका वानस्पतिक नाम क्लोमा विस्कोसा (Cleoma Viskosa) है।

यह 500 से 1500 मीटर ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में बरसात के दिनों में स्वतः ही खरपतवार की तरह खेतों की मेड़ों पर, खुले पड़े मैदानों, नदियों के किनारे उगने लगते हैं।.

धीरे-धीरे पौधे बड़े होकर लगभग एक मीटर ऊंचाई के हो जाते हैं और पहले इन पर सरसों (mustard) की तरह पीले-पीले फूल और फिर सरसों जैसी ही फलियां आने लगती हैं. परिपक्व होने पर ये फलियां जामुनी रंग की हो जाती हैं । और अक्टूबर आते-आते पीली पड़कर खुद ही फटने लगती हैं।

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Wild mustard : स्वाद और खुशबू का खजाना एक चुटकी जखिया
Wild mustard : स्वाद और खुशबू का खजाना एक चुटकी जखिया

फलियों के फटने का मतलब अब जखिया (Wild mustard) काटकर झाड़ने के लिए तैयार हैं. इस समय इन्हें काटकर तिरपाल या किसी कपड़े पर फैला कर दो-चार दिन की धूप और दिखाई जाती है। तथा उसके बाद इसके बीजों को इकट्ठा करके रख लिया जाता है.अब मसाले के रूप में यह आपकी रसोई को लम्बे समय तक महकाने के लिए तैयार हो जाता है।

जखिया (Wild mustard) का स्वाद एक बार जिसकी जुबान पर लग गया वह इसका मुरीद हो जाता है। पहाड़ी रसोइयों से जीमकर गए विदेशी तक इसके स्वाद के दीवाने हैं। एवं इसके दानों को साल भर तड़के के रूप में विभिन्न सब्जियों व दालों ( आलू के गुटके, गडेरी, लौकी, तुरई, हरा साग, आलू.मूली के थेचुए और झोई (कढ़ी) आदि ) में इस्तेमाल किया जाता है.

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फ्राई राइस में अगर जखिये का तड़का लगा दिया जाए तो इससे अच्छा कोई विकल्प ही नहीं. कुछ लोगों को मैंने जखिया का चटपटा नमक बनाकर इस्तेमाल करते देखा है. चूंकि इसके बीजों का रंगरूप व आकार सरसों या राई के दानों जैसा ही होता है, इसलिए इसे जंगली सरसों भी कहा जाता है. अंग्रेजी में इसे वाइल्ड मस्टर्ड या ड़ॉग मस्टर्ड कहा जाता है।

जखिया (Wild mustard) न केवल तड़के व नमक के घटक द्रव्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, बल्कि इसकी औषधीय महता भी काफी है आयुर्वेद में जखिया को बुखार, खांसी, जलन, हैजा आदि बीमारियों के लिए उपयोगी औषधि बताया गया है

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एक अध्ययन के अनुसार ऐसी लगभग 124 प्रकार की वनस्पतियां है जिनका प्रयोग पर्वतीय क्षेत्र वैद्य पारंपरिक चिकित्सा में करते हैं।अगर किसी को चोट लग जाती है तो घाव को भरने के लिए उस पर जखिया (Wild mustard) के पत्तों का लेप बनाकर लगाया जाता है इस प्रकार यह एक बेहतरीन फर्स्ट ऐड का काम भी करता है

कुछ वर्षों में चिकित्सा अनुसंधानों में ऐसा भी सामने आया है कि जखिया का तेल (Wild mustard oil) दिमागी बीमारियों को ठीक करने में उपयोगी साबित हो सकता है

शायद इसके बहुआयामी उपयोगों के कारण ही गढ़वाल मंडल में ऐसी परंपरा है कि जिन गांवों में जखिया नहीं होता है, उन गांवों के लोगों को उनके वे रिश्तेदार सौगात के तौर पर जखिया (Wild mustard) भेजते हैं जिनके गांवों में जखिया पाया जाता है

Wild mustard
Wild mustard

इस्तेमाल के लिए तैयार जखिया

पिछले कुछ वर्षों में जखिया (Wild mustard) के बारे में पहाड़ (उत्तराखंड) से बाहर के लोगों को भी जानकारी हुई है तो वे भी इसके लाजवाब स्वाद के मुरीद बन गए हैं देहरादून के एक पहाड़ी व्यंजन परोसने वाले रेस्टोरेंट के मेन्यू में तो जखिया राइस सर्वाधिक लोकप्रिय डिश बन गई है

जीरा राइस की तरह जखिया में फ्राई किए चावलों की इस डिश का रेस्टोरेंट में आने वाला हर तीसरा ग्राहक ऑर्डर करता है उधर, उत्तराखंड से शेफ की नौकरी करने गए युवाओं ने जाखिये को विदेश में भी लोकप्रिय बना दिया है विदेश में कई रेस्टोरेंट ने जखिया राइस को अपने इंडियन कुजिन सेक्शन में प्रमुखता से दर्ज किया हुआ है

जाखिये के बीज में पाए जाने वाला 18 फीसदी तेल फैटी एसिड तथा अमीनो अम्ल से भरपूर होता है। इसके बीजों में फाइबर, स्टार्च, कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, विटामिन ई व सी, कैल्शियम, मैगनीशियम, पोटेशियम, सोडियम, आयरन, मैगनीज और जिंक आदि पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं।

जखिया (Wild mustard) की लोकप्रियता तो बढ़ रही है, लेकिन पहाड़ो में हो रहे पलायन के कारण इसकी पैदावार में कमी आ रही है। लेकिन जाखिये की खेती की जाये तो यह एक फायदे का सोदा होगा।

क्युकी इसकी फसल के लिए दो-दो फीट की दूरी पर भी पौधे लगाए जाए तो प्रति बीघा 1681 पौधे लग सकते हैं एक पौधा लगभग सौ ग्राम उपज दे देता हैइस प्रकार एक बीघा औसत में 168 किलो और पांच बीघा मे लगभग साढ़े आठ क्विंटल जखिया पैदा किया जा सकता है

अगर हम इस जाखिये को थोक भाव में डेढ़ सौ रुपये किलो भी बेचे तो इसकी कीमत एक लाख छब्बीस हजार रुपये बनती है जाखिये (Wild mustard) की खेती में सबसे अच्छी बात यह है कि यह खेती जानवरों के प्रकोप से मुक्त, कम मेहनत, बिना किसी खाद-पानी व कीटनाशक के इस्तेमाल के दुनिया में कोई फसल इतने अधिक दाम नहीं दे सकती

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